Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 443

1875 Mantra
Devata- उषाः Rishi- संवर्त आङ्गिरसः Chhand- द्विपदा विराट् पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
आ꣡ या꣢हि꣣ व꣡न꣢सा स꣣ह꣡ गाव꣢꣯ सचन्त वर्त꣣निं꣡ यदूध꣢꣯भिः ॥४४३॥

आ꣢ । या꣣हि । व꣡न꣢꣯सा । स꣣ह꣢ । गा꣡वः꣢꣯ । स꣣चन्त । वर्त्तनि꣢म् । यत् । ऊ꣡ध꣢꣯भिः ॥४४३॥

Mantra without Swara
आ याहि वनसा सह गाव सचन्त वर्तनिं यदूधभिः ॥

आ । याहि । वनसा । सह । गावः । सचन्त । वर्त्तनिम् । यत् । ऊधभिः ॥४४३॥

Samveda - Mantra Number : 443
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 1;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 10;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
हे परमेश्वर ! (यत्) जबकि [उषा देवता = प्रातर्बेला] (आयाहि) आवे [तभी] (गावः) गोरूप हमारी वाणियें (ऊधभिः) दुग्ध भरे स्तनों सहित (वर्त्तनिम्) मार्ग को (सचन्त) संगत हों॥
प्रतिदिन प्रातःकल उपा की बेला में वेदवाणियों को हम प्राप्त हों, कृपया ऐसा प्रसाद कीजिये॥
शतपथ ब्राह्मण १४। ६। १२।१ में वाणी को गोरूप से इस प्रकार वर्णन किया है कि — “वाणीरूप धेनु की उपासना करो। उसके ४ थन हैं। १ – स्वाहाकार। २–वषट्कार। ३―हन्तकार और ४–स्वधाकार। उसके दो थन स्वाहाकार और वषट्कार को देवता पीते हैं। तथा हन्तकार को मनुष्य और स्वधाकार को पितर। उसका बैल प्राण है और बछड़ा मन॥
Footnote
ऋ० १०। १७२। १ में भी॥