Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 441

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- त्रसदस्युः Chhand- द्विपदा विराट् पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
शं꣢ प꣣दं꣢ म꣣घ꣡ꣳ र꣢यी꣣षि꣢णे꣣ न꣡ काम꣢꣯मव्र꣢तो꣡ हि꣢नोति꣣ न꣡ स्पृ꣢शद्र꣣यि꣢म् ॥४४१

श꣢म् । प꣣द꣢म् । म꣣घ꣢म् । र꣣यीषि꣡णे꣢ । न । का꣡म꣢꣯म् । अ꣣व्रतः꣢ । अ꣣ । व्रतः꣢ । हि꣣नोति । न꣢ । स्पृ꣣शत् । रयि꣢म् ॥४४१॥

Mantra without Swara
शं पदं मघꣳ रयीषिणे न काममव्रतो हिनोति न स्पृशद्रयिम् ॥४४१

शम् । पदम् । मघम् । रयीषिणे । न । कामम् । अव्रतः । अ । व्रतः । हिनोति । न । स्पृशत् । रयिम् ॥४४१॥

Samveda - Mantra Number : 441
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 1;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 10;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
प्रकरण से — हे इन्द्र ! धनवन् ! परमात्मन् ! (अव्रतः) यज्ञादि सुकृत न करने वाला कृपण पुरुष (रयिम्) धन को (न स्पृशत्) छूने भी नहीं पाता, तथा (कामम्) अभीष्ट पदार्थों को (न हिनोति) नहीं प्राप्त होता परन्तु (रयीषिणे) यज्ञादि उत्तम कर्मों में धन देने वाले के लिये (शम् पदम्) कल्याण स्थान और (मघम्) धन होता है॥
जो लोग यज्ञादि उत्तम कार्यों में धनादि व्यय करते हैं वे धन धान्यादि सकल इष्ट पदार्थों को प्राप्त होते हैं और इसके विरुद्ध लोग दरिद्र होते हैं।
Footnote
निघण्टु २। १० इत्यादि प्रमाण संस्कृतभाष्य में देखिये॥