Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 440

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- त्रसदस्युः Chhand- द्विपदा विराट् पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
अ꣡न꣢वस्ते꣣ र꣢थ꣣म꣡श्वा꣢य तक्षु꣣स्त्व꣢ष्टा꣣ व꣡ज्रं꣢ पुरुहूत द्यु꣣म꣡न्त꣢म् ॥४४०॥

अ꣡न꣢꣯वः । ते꣣ । र꣡थ꣢꣯म् । अ꣡श्वा꣢꣯य । त꣣क्षुः । त्व꣡ष्टा꣢꣯ । व꣡ज्र꣢꣯म् । पु꣣रुहूत । पुरु । हूत । द्युम꣡न्त꣢म् ॥४४०॥

Mantra without Swara
अनवस्ते रथमश्वाय तक्षुस्त्वष्टा वज्रं पुरुहूत द्युमन्तम् ॥

अनवः । ते । रथम् । अश्वाय । तक्षुः । त्वष्टा । वज्रम् । पुरुहूत । पुरु । हूत । द्युमन्तम् ॥४४०॥

Samveda - Mantra Number : 440
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 1;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 10;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(अनवः) मनुष्य लोग (अश्वाय) शीघ्र मोक्षप्राप्त्यर्थ (ते) आप को (रथम्) रथ (तक्षुः) बनाते हैं। (पुरुहूत) हे बहुतों से पुकारे हुए ! परमात्मन् ! (त्वष्टा) विद्या से प्रदीप्त पुरुष आप को (द्युमन्तम् वज्रम्) प्रकाशमान शस्त्र [बनाता है]॥
ईश्वर के भक्त लोग शीघ्र मोक्षपद को प्राप्त होने के लिये परमेश्वर को ही अपना रथ बनाते और उसी को सर्वपापशत्रुसंहारार्थ शस्त्रभाव से कल्पना करते हैं।
Footnote
ऋ० ५। ३१। ४ में पूर्वार्ध यही है, केवल (तक्षुः = तक्षन्) है॥