Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 44

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- सौभरि: काण्व: Chhand- बृहती Swara- मध्यमः Kaand Name- आग्नेयं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- आग्नेयं पर्व
Mantra with Swara
यो꣢꣫ विश्वा꣣ द꣡य꣢ते꣣ व꣢सु꣣ हो꣡ता꣢ म꣣न्द्रो꣡ जना꣢꣯नाम् । म꣢धो꣣र्न꣡ पात्रा꣢꣯ प्रथ꣣मा꣡न्य꣢स्मै꣣ प्र꣡ स्तोमा꣢꣯ यन्त्व꣣ग्न꣡ये꣢ ॥४४॥

यः꣢ । वि꣡श्वा꣢꣯ । द꣡य꣢꣯ते । व꣡सु꣢꣯ । हो꣡ता꣢꣯ । म꣣न्द्रः꣢ । ज꣡ना꣢꣯नाम् । म꣡धोः꣢꣯ । न । पा꣡त्रा꣢꣯ । प्र꣣थमा꣢नि꣢ । अ꣣स्मै । प्र꣢ । स्तो꣡माः꣢꣯ । य꣣न्तु । अग्न꣡ये꣢ ॥४४॥

Mantra without Swara
यो विश्वा दयते वसु होता मन्द्रो जनानाम् । मधोर्न पात्रा प्रथमान्यस्मै प्र स्तोमा यन्त्वग्नये ॥

यः । विश्वा । दयते । वसु । होता । मन्द्रः । जनानाम् । मधोः । न । पात्रा । प्रथमानि । अस्मै । प्र । स्तोमाः । यन्तु । अग्नये ॥४४॥

Samveda - Mantra Number : 44
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 4;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 4;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(यः) जो (होता) कर्मफलप्रदाता (मन्द्रः) आनन्ददाता (जनानाम्) मनुष्यों के लिये (विश्वा वसु) सब प्रकार के, विद्यादि धन (दयते) देता है (अस्मै, अग्नये) इस, परमात्मा के लिये (मधोः पात्रा न) मधु के, पात्रों के समान (प्रथमानि) मुख्य उत्तम (प्रस्तोमा) स्तोत्र (यन्तु) प्राप्त हों।
परमात्मा ही कर्म का फल पहुँचाता है उसके बिना किये कर्मों की हानि और न किये पापों का शिर मढा जाना हो जाता है। इसलिये उस दयालु के धन्यवादरूपी मधुर वचन जैसे मानो मधुर रस के पात्र हों, ऐसे मधुर मुख्य स्तोत्र पढ़े जावें, वह हमको नाना प्रकार के विद्यादि रत्नरूप धन देता है।
भौतिक पक्ष में— (होता) होमने वाला (मन्द्रः) और उससे जानन्द का दाता (यः) जो (जनानाम्) मनुष्यों के लिए (विश्वा, वसु, दयते) सम्पूर्ण, सुखसाधन धन, देता है (अस्मै, अग्नये) इस, अग्नि के लिये (प्रथमानि, प्रस्तोमा) मुख्य स्तुतियें (यन्तु) पहुँचे॥
परमात्मा उपदेश करता है कि हे मनुष्यो ! जिस अग्नि में तुम सुगन्ध मिष्ट पुष्ट रोगनाशकादि नाना पदार्थों को होमते हो और उन पदार्थों को वायु यथास्थान बादल ओषधि वनस्पति आदि में पहुँचाता है और तुम्हें आनन्द देता है तथा सब धान्यादि धन देता है, तुम उस अग्नि के गुणों को स्वयं जानने और अन्यों को जताने के लिये साथ-साथ अग्नि की स्तुति किया करो अर्थात् अग्नि के गुण वर्णन वाले मन्त्रों का पाठ भी करते जाया करो। जिससे उस अग्नि विद्या के द्वारा सब सुखों को प्राप्त करके कृतकृत्य होओ॥
Footnote
अष्टाध्यायी ७। १। ३९॥ २। ३। ५०॥ २। ३। ६२॥ निघं० ४। १॥ २। १०॥ ३। १४॥ निरुक्त १। ४॥ उणादि १। ९५॥ २। १३॥ २। ११६॥ १। १४० के प्रमाण संस्कृतभाष्य में देखिये॥ ऋग्वेद (८। ९२। ६) में “यन्त्यग्नये” इतना पाठ में भेद है॥