Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 439

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- त्रसदस्युः Chhand- द्विपदा विराट् पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
ब्र꣣ह्मा꣢ण꣣ इ꣡न्द्रं꣢ म꣣ह꣡य꣢न्तो अ꣣र्कै꣡र꣢꣯वर्धय꣣न्न꣡ह꣢ये꣣ ह꣢न्त꣣वा꣡ उ꣢ ॥४३९॥

ब्र꣣ह्मा꣡णः꣢ । इ꣡न्द्र꣢꣯म् । म꣣ह꣡य꣢न्तः । अ꣣र्कैः꣢ । अ꣡व꣢꣯र्धयन् । अ꣡ह꣢꣯ये । हन्त꣣वै꣢ । उ꣣ ॥४३९॥

Mantra without Swara
ब्रह्माण इन्द्रं महयन्तो अर्कैरवर्धयन्नहये हन्तवा उ ॥

ब्रह्माणः । इन्द्रम् । महयन्तः । अर्कैः । अवर्धयन् । अहये । हन्तवै । उ ॥४३९॥

Samveda - Mantra Number : 439
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 1;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 10;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(अहये हन्तवे) सर्वतुल्य मारक पाप को मारने के लिये (उ) निश्चय करके (ब्रह्माणः) चतुर्वेदवेत्ता लोग (अर्कैः) मन्त्रों से (इन्द्रम्) परमेश्वर को (महयन्तः) पूजते हुए (अवर्धयन्) “प्रसन्न करते हैं” यही सायणाचार्य का अर्थ है॥
निश्चय परमेश्वर की स्तुति उपासनाओं से मनुष्य पापों से बचते और परमात्मा को प्रसन्न करते हैं।
Footnote
निरुक्त ५। ५ निघण्टु ३। १५ के प्रमाण संस्कृतभाष्य में देखिये॥ ऋ० ५। ३१। ४ में उत्तरार्ध ऐसा ही है॥