Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 436

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- ऋण0त्रसदस्यू Chhand- द्विपदा विराट् पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
प꣡व꣢स्व सोम द्यु꣣म्नी꣡ सु꣢धा꣣रो꣢ म꣣हा꣡ꣳ अवी꣢꣯ना꣣म꣡नु꣢पू꣣र्व्यः꣢ ॥४३६॥

प꣡व꣢꣯स्व । सो꣣म । द्युम्नी꣢ । सु꣣धारः꣢ । सु꣣ । धारः꣢ । म꣣हा꣢न् । अ꣡वी꣢꣯नाम् । अ꣡नु꣢꣯ । पू꣣र्व्यः꣢ ॥४३६॥

Mantra without Swara
पवस्व सोम द्युम्नी सुधारो महाꣳ अवीनामनुपूर्व्यः ॥

पवस्व । सोम । द्युम्नी । सुधारः । सु । धारः । महान् । अवीनाम् । अनु । पूर्व्यः ॥४३६॥

Samveda - Mantra Number : 436
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 5;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 9;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(सोम) ओषधे ! (द्युम्नी) अन्नवान् अर्थात् पुष्टिमान् (सुधारः) सुन्दर धारा वाला (महान्) उत्तम (अवीनां पूर्व्यः) रक्षक पदार्थों में मुख्य (अनु) क्रम से (पवस्व) शुद्धि कर।
अर्थात् सोम ऐसा खींचना चाहिये जिससे स्वच्छ उत्तम धारायुक्त हो। ऐसा करने से, यह क्रम से पुष्टि, रक्षा और शुद्धि करता है॥
Footnote
निरुक्त ५। ५ का प्रमाण संस्कृतभाष्य में देखिये॥ ऋग्वेद ९। १०९। ७ में भी॥