Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 422

1875 Mantra
Devata- सोमः Rishi- विमद ऐन्द्रः Chhand- पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
भ꣣द्रं꣢ नो꣣ अ꣡पि꣢ वातय꣣ म꣢नो꣣ द꣡क्ष꣢मु꣣त꣡ क्रतु꣢꣯म् । अ꣡था꣢ ते स꣣ख्ये꣡ अन्ध꣢꣯सो꣣ वि꣢ वो꣣ म꣢दे꣣ र꣢णा꣣ गा꣢वो꣣ न꣡ यव꣢꣯से꣣ वि꣡व꣢क्षसे ॥४२२॥

भ꣣द्र꣢म् । नः꣣ । अ꣡पि꣢꣯ । वा꣣तय । म꣡नः꣢꣯ । द꣡क्ष꣢꣯म् । उ꣣त꣢ । क्र꣡तु꣢꣯म् । अ꣡थ꣢꣯ । ते꣣ । सख्ये꣢ । स꣣ । ख्ये꣢ । अ꣡न्ध꣢꣯सः । वि । वः꣣ । म꣡दे꣢꣯ । र꣡ण꣢꣯ । गा꣡वः꣢꣯ । न । य꣡व꣢꣯से । वि꣡व꣢꣯क्षसे ॥४२२॥

Mantra without Swara
भद्रं नो अपि वातय मनो दक्षमुत क्रतुम् । अथा ते सख्ये अन्धसो वि वो मदे रणा गावो न यवसे विवक्षसे ॥

भद्रम् । नः । अपि । वातय । मनः । दक्षम् । उत । क्रतुम् । अथ । ते । सख्ये । स । ख्ये । अन्धसः । वि । वः । मदे । रण । गावः । न । यवसे । विवक्षसे ॥४२२॥

Samveda - Mantra Number : 422
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 4;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 8;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
सोम ! शान्तस्वरूप ! परमेश्वर ! वा चन्द्र ! वा सोमाख्य ओषधे ! (नः) हमारे (मनः) मन को (भद्रम्) सुखदायी (दक्षम्) चतुर (उत) और (ऋतुम्) शुभ कर्म को (वातय) प्राप्त कराये (अथ) और (ते) तेरी (सख्ये) अनुकूलवर्त्तिता में (अन्धसः मदे) भोज्यादि के हर्ष में हम (दिवः) तेरा स्वीकार करते हैं। (न) जैसे (रणाः) प्रीतियुक्त (गावः) गौवें (यवसे) घास आदि में (विवक्षसे) हर्ष को पाती हैं तद्वत्॥
चन्द्रमा के प्रकाश और सोम ओषधि से मन प्रफुल्लित होता है इत्यादि तो प्रसिद्ध ही है। इस में भी (विवोमदे) का व्याख्यान पूर्व (२ य) मन्त्र के समान सायणाचार्य ने ठीक नहीं किया। इस पर (वः) की व्याख्या का तो सत्यव्रत सामाश्रमी जी ने भी सायणभाष्य में प्रश्न करके ही छोड़ दिया है।
Footnote
ऋ० १०। २०। १ में केवल “भद्रं नो अपि वातय मनः” इतना पाठ मिलता है॥