Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 421

1875 Mantra
Devata- उषाः Rishi- सत्यश्रवा आत्रेयः Chhand- पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
म꣣हे꣡ नो꣢ अ꣣द्य꣡ बो꣢ध꣣यो꣡षो꣢ रा꣣ये꣢ दि꣣वि꣡त्म꣢ती । य꣡था꣢ चिन्नो꣣ अ꣡बो꣢धयः स꣣त्य꣡श्र꣢वसि वा꣣य्ये꣡ सुजा꣢꣯ते꣣ अ꣡श्व꣢सूनृते ॥४२१॥

म꣣हे꣢ । नः꣣ । अद्य꣢ । अ꣣ । द्य꣢ । बो꣣धय । उ꣡षः꣢꣯ । रा꣣ये꣢ । दि꣣वि꣡त्म꣢ती । य꣡था꣢꣯ । चि꣣त् । नः । अ꣡बो꣢꣯धयः । स꣣त्य꣡श्र꣢वसि । स꣣त्य꣢ । श्र꣣वसि । वाय्ये꣢ । सु꣡जा꣢꣯ते । सु । जा꣣ते । अ꣡श्व꣢꣯सूनृते । अ꣡श्व꣢꣯ । सू꣣नृते ॥४२१॥

Mantra without Swara
महे नो अद्य बोधयोषो राये दिवित्मती । यथा चिन्नो अबोधयः सत्यश्रवसि वाय्ये सुजाते अश्वसूनृते ॥

महे । नः । अद्य । अ । द्य । बोधय । उषः । राये । दिवित्मती । यथा । चित् । नः । अबोधयः । सत्यश्रवसि । सत्य । श्रवसि । वाय्ये । सुजाते । सु । जाते । अश्वसूनृते । अश्व । सूनृते ॥४२१॥

Samveda - Mantra Number : 421
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 4;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 8;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(सत्यश्रवसि) जिस में ठीक-ठीक श्रवण होता है वैसी (सुजाते) जिसका जन्म शोभायुक्त है ऐसी (अश्वसूनुते) जिस में प्रिय शब्द व्याप जाता है इस प्रकार की (वाय्ये) विस्तार वाली ! (उषः) प्रभात वेला (यथाचित्) जिस प्रकार (नः) हम को (अबोधयः) पूर्व जगाती रही है उसी प्रकार (अद्य) अब भी (दिवित्मती) प्रकाश वाली तू (महे राये) महाधन धान्यादि के लिये (नः) हम को (बोधय) जगा॥
इसमें उषा की प्रशंसा के साथ परमात्मा का यह उपदेश है कि जो लोग उपः काल—प्रभात वेला में जागते हैं वे उद्यमी कर्मण्य और धन धान्याद्यैश्वर्यशाली होत हैं। और जो स्त्री उषा के समान गुण, कर्म, स्वभाव वाली होती है उस के घर में लक्ष्मी निवास करती है। जिस प्रकार उषःकाल में जगने से यथार्थ श्रवणादि व्यवहार होता है और उषःकाल का जन्म सबको अच्छा लगता है, सब पक्षिगणादि प्यारे शब्द बोलते हैं और उषा सब ओर फैलकर शोभा बढ़ाती है और सबको प्रकाशित करती है, इसी प्रकार स्त्रियों को भी सद्गुणाढ्य होना चाहिये॥
Footnote
ऋ० ५। ७९। १ में भी॥