Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 41

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- शंयुर्बार्हस्पत्यः Chhand- बृहती Swara- मध्यमः Kaand Name- आग्नेयं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- आग्नेयं पर्व
Mantra with Swara
त्वं꣡ न꣢श्चि꣣त्र꣢ ऊ꣣त्या꣢꣫ वसो꣣ रा꣡धा꣢ꣳसि चोदय । अ꣣स्य꣢ रा꣣य꣡स्त्वम꣢꣯ग्ने र꣣थी꣡र꣢सि वि꣣दा꣢ गा꣣धं꣢ तु꣣चे꣡ तु नः꣢꣯ ॥४१॥

त्व꣢म् । नः꣣ । चित्रः꣢ । ऊ꣣त्या꣢ । व꣡सो꣢꣯ । रा꣡धाँ꣢꣯सि । चो꣣दय । अस्य꣢ । रा꣣यः꣢ । त्वम् । अ꣣ग्ने । रथीः꣢ । अ꣣सि । विदाः꣢ । गा꣣ध꣢म् तु꣣चे꣢ । तु । नः꣣ ॥४१॥

Mantra without Swara
त्वं नश्चित्र ऊत्या वसो राधाꣳसि चोदय । अस्य रायस्त्वमग्ने रथीरसि विदा गाधं तुचे तु नः ॥

त्वम् । नः । चित्रः । ऊत्या । वसो । राधाँसि । चोदय । अस्य । रायः । त्वम् । अग्ने । रथीः । असि । विदाः । गाधम् तुचे । तु । नः ॥४१॥

Samveda - Mantra Number : 41
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 4;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 4;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(वसो) घट-घट वासी ! (अग्ने) ज्ञानस्वरूप ! (त्वम्) आप (नः) हमारी (ऊत्या) रक्षा के साथ (राधांसि) विद्यादि धनों को (चोदय) प्राप्त कराइये, क्योंकि (त्वम्) आप ही (अस्य, रायः) इस, धन के (चित्रः, रथीः) विचित्र दाता हैं। (तु) और (तुचे) सन्तान के लिये (गाधं, (विदाः) आश्रय दीजिये॥
जो परमात्मा के प्यारे सदा उसी का भरोसा, शरण, आश्रय रखते हैं, उसी के उपासक और आज्ञापालक रहते हैं, वह दयालु परमात्मा उन्हें और उनके सन्तानों को अनेकशः विद्यादि धनों से भरपूर करता और आश्रय देता है तथा उनकी रक्षा करता है। क्योंकि वही सम्पूर्ण धन आश्रय और रक्षा के साधनों का स्वामी और उनमें वास कर रहा है॥
भौतिक पक्ष में— (वसो) ८ वसुओं में एक ! (अग्ने) अग्ने ! (त्वम्) तू (नः) हमारी (ऊत्या) रक्षा से (राधांसि) रत्नादि धनों को (चोदय) प्राप्त करा। क्योंकि (त्वम्) तू (अस्य) इस युद्धादि में निर्जित (रायः) धन का (चित्रः) विचित्र (रथीः) नेता (असि) है। (तु) और (तुचे) सन्तान के लिये (गाधम्) आश्रय (विदाः) मिला॥
अग्नि ८ वसुओं में एक विचित्र वसु है जिसके प्रभाव से मनुष्य अपनी रक्षा और शत्रु का पराजय करके उसके धनादि को पा सकते हैं तथा अपनी सन्तान के लिये आश्रय दिला सकते हैं। अग्नि आश्चर्य गुणों से ऊपर कहे कार्यों का साधक है, उसके गुण खोजने और तदनुसार अग्नि को काम में लाना चाहिये॥
Footnote
निघं० २।१४॥ २।२ के प्रमाण संस्कृतभाष्य में देखने चाहियें। ऐसा ही पाठ ऋग्वेद (६।४८।९) में भी है॥