Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 406

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- नृमेध आङ्गिरसः Chhand- ककुप् Swara- ऋषभः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
अ꣢धा꣣꣬ ही꣢꣯न्द्र गिर्वण꣣ उ꣡प꣢ त्वा꣣ का꣡म꣢ ई꣣म꣡हे꣢ ससृ꣣ग्म꣡हे꣢ । उ꣣दे꣢व꣣ ग्म꣡न्त꣢ उ꣣द꣡भिः꣢ ॥४०६॥

अ꣡ध꣢꣯ । हि । इ꣣न्द्र । गिर्वणः । गिः । वनः । उ꣡प꣢꣯ । त्वा꣣ । का꣡मे꣢꣯ । ई꣣म꣡हे꣢ । स꣣सृग्म꣡हे꣢ । उ꣣दा꣢ । इ꣣व । ग्म꣡न्त꣢꣯ । उ꣣द꣡भिः꣢ ॥४०६॥

Mantra without Swara
अधा हीन्द्र गिर्वण उप त्वा काम ईमहे ससृग्महे । उदेव ग्मन्त उदभिः ॥

अध । हि । इन्द्र । गिर्वणः । गिः । वनः । उप । त्वा । कामे । ईमहे । ससृग्महे । उदा । इव । ग्मन्त । उदभिः ॥४०६॥

Samveda - Mantra Number : 406
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 2;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 6;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(गिर्वणः) हे वाणी से सेवनीय ! (इन्द्र) राजन् ! (त्वा) आप से (ईमहे) हम याचना करते हैं (अध हि) तब ही (कामः) अभीष्ट कामना को (उप ससृग्महे) समीप स्पर्श करते हैं। दृष्टान्त — (इव) जैसे (उदाग्मन्तः) जल के साथ चलने वाले (उदभिः) जलों से स्पर्श करते हैं।
अर्थात् जो जल के समीप जाते हैं वे जलों को जैसे प्राप्त होते वा जो जल में घुमते हैं वे जैसे सब ओर से तर हो जाते हैं, इसी प्रकार जब हम सर्वैश्वर्य सम्पन्न के समीप जाकर याचना करते हैं तो कामना तत्काल पूरी होती है॥
Footnote
निघण्टु ३। १९॥ अष्टाध्यायी ७। १। ३९॥ ४। ३। ११७ के प्रमाण और ऋ० ८। ९८। ७ का पाठभेद संस्कृत भाष्य में देखिये॥