Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 402

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- सौभरि: काण्व: Chhand- ककुप् Swara- ऋषभः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
आ꣡ या꣢ह्य꣣य꣢꣫मिन्द꣣वे꣡ऽश्व꣢पते꣣ गो꣡प꣢त꣣ उ꣡र्व꣢रापते । सो꣡म꣢ꣳ सोमपते पिब ॥४०२॥

आ꣢ । या꣣हि । अय꣢म् । इ꣡न्द꣢꣯वे । अ꣡श्व꣢꣯पते । अ꣡श्व꣢꣯ । प꣣ते । गो꣡प꣢꣯ते । गो । प꣣ते । उ꣡र्व꣢꣯रापते । उ꣡र्व꣢꣯रा । प꣣ते । सो꣡म꣢꣯म् । सो꣣मपते । सोम । पते । पिब ॥४०२॥

Mantra without Swara
आ याह्ययमिन्दवेऽश्वपते गोपत उर्वरापते । सोमꣳ सोमपते पिब ॥

आ । याहि । अयम् । इन्दवे । अश्वपते । अश्व । पते । गोपते । गो । पते । उर्वरापते । उर्वरा । पते । सोमम् । सोमपते । सोम । पते । पिब ॥४०२॥

Samveda - Mantra Number : 402
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 2;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 6;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(अश्वपते) हे घोड़ों के स्वामिन् ! (गोपते) गौवों के स्वामिन् ! (उर्वरापते) धान्ययुक्त पृथिवी के स्वामिन् ! (सोमपते) सोमादि ओषधि वर्ग के रक्षक और स्वामिन् ! (सोमं पिब) सोमरस पीजिये और (इन्दवे) आप प्रकाशमान के लिये (अयम्) यह मैं (आयाहि) प्राप्त होता हूँ॥
जबकि राजा विजय करता है तब सोमादि की भेंट लिये शत्रुगण उपस्थित होते हैं कि घोड़े, गौ, पृथिवी आदि सब के आप स्वामी हैं, भेंट ग्रहण कीजिये॥
Footnote
ऋ० ८। २१। ३ का पाठभेद संस्कृतभाष्य में देखिये॥