Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 40

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- प्रस्कण्वः काण्वः Chhand- बृहती Swara- मध्यमः Kaand Name- आग्नेयं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- आग्नेयं पर्व
Mantra with Swara
अ꣢ग्ने꣣ वि꣡व꣢स्वदु꣣ष꣡स꣢श्चि꣣त्र꣡ꣳ राधो꣢꣯ अमर्त्य । आ꣢ दा꣣शु꣡षे꣢ जातवेदो वहा꣣ त्व꣢म꣣द्या꣢ दे꣣वा꣡ꣳ उ꣢ष꣣र्बु꣡धः꣢ ॥४०॥

अ꣡ग्ने꣢ । वि꣡व꣢꣯स्वत् । वि । व꣣स्वत् । उष꣡सः꣢ । चि꣣त्र꣢म् । रा꣡धः꣢꣯ । अ꣣मर्त्य । अ । मर्त्य । आ꣢ । दा꣣शु꣡षे꣢ । जा꣣तवेदः । जात । वेदः । वह । त्व꣢म् । अ꣣द्य꣢ । अ꣣ । द्य꣢ । दे꣣वा꣢न् । उ꣣षर्बु꣡धः꣢ । उ꣣षः । बु꣡धः꣢꣯ ॥४०॥

Mantra without Swara
अग्ने विवस्वदुषसश्चित्रꣳ राधो अमर्त्य । आ दाशुषे जातवेदो वहा त्वमद्या देवाꣳ उषर्बुधः ॥

अग्ने । विवस्वत् । वि । वस्वत् । उषसः । चित्रम् । राधः । अमर्त्य । अ । मर्त्य । आ । दाशुषे । जातवेदः । जात । वेदः । वह । त्वम् । अद्य । अ । द्य । देवान् । उषर्बुधः । उषः । बुधः ॥४०॥

Samveda - Mantra Number : 40
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 4;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 4;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(जातवेदः) वेदों के प्रकाशक ! (अमर्त्य) अमर ! (अग्ने) परमात्मन् ! (त्वम्) आप (राधः) भक्तिधन (दाशुषे) देने वाले उपासक के लिये (उषसः) प्रभात वेला के (विवस्वत्) रंग-विरंगे वस्त्र से धारे हुए (चित्रम्) चित्र और (उषर्बुधः) प्रभात में चेतने वाले (देवान्) ज्ञानेन्द्रियों को (अद्य) अत्र (आ-वह) प्राप्त कराइये॥
जो मनुष्य प्रभात में उठकर परमात्मा का ध्यान-उपासना करते हैं उन्हें दयालु जगत्पिता, प्रभात बेला के विचित्र चित्र और ज्ञानेन्द्रियों की चेत देते हैं. जिससे वे उस-उस इन्द्रिय से धर्मानुकूल कार्य लेते हुए सुखी होवें॥
भौतिक पक्ष में— (जातवेदः) प्रकाश से ज्ञान के उभारने वाले ! (अमर्त्य) देव ! (अग्ने) अग्ने ! (त्वम्) तू (राधः) हव्यरूप धन (दाशुषे) देने वाले याज्ञिक के लिये (विवस्वत्) विविध वस्त्र से धारे हुए (उषसः चित्रम्) प्रभात वेला के, चित्र और (उषर्बुधः, देवान्) प्रभात में चेतने वाले, इन्द्रियों को (अद्य) अब (आ-वह) प्राप्त करा॥
आशय यह है कि मनुष्य को प्रभात में उठकर होम करना चाहिये। अग्नि के ही प्रभाव से सूर्य से उषा = प्रभात बेला उत्पन्न होती है जो लाल-लाल वस्त्र से धारती हुई अपने चित्र को दिखाती है और जिसके प्रभाव से मनुष्यों के रात्रि में मृतप्राय ज्ञानेन्द्रिय फिर जागते हैं। जो मनुष्य प्रभातयाजी हैं वे विशेष सुखपूर्वक उषा के उदय और ज्ञानेन्द्रियों की चेत को पाते और सुखी होते हैं।
Footnote
निघं० २।१०॥ ३।२० अष्टाध्यायी ६। १।१२॥ ६।३।१३५॥ ६।३।१३६ के प्रमाण संस्कृतभाष्य में देखिये॥ ऐसा ही पाठ ऋग्वेद १।४४।१ में भी है॥