Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 4

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- आग्नेयं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- आग्नेयं पर्व
Mantra with Swara
अ꣣ग्नि꣢र्वृ꣣त्रा꣡णि꣢ जङ्घनद्द्रविण꣣स्यु꣡र्वि꣢प꣣न्य꣡या꣢ । स꣡मि꣢द्धः शु꣣क्र꣡ आहु꣢꣯तः ॥४॥

अ꣣ग्निः꣢ । वृ꣣त्रा꣡णि꣢ । ज꣣ङ्घनत् । द्रविणस्युः꣢ । वि꣣पन्य꣡या꣢ । स꣡मि꣢꣯द्धः । सम् । इ꣣द्धः । शुक्रः꣢ । आ꣡हु꣢꣯तः । आ । हु꣣तः ॥४॥

Mantra without Swara
अग्निर्वृत्राणि जङ्घनद्द्रविणस्युर्विपन्यया । समिद्धः शुक्र आहुतः ॥

अग्निः । वृत्राणि । जङ्घनत् । द्रविणस्युः । विपन्यया । समिद्धः । सम् । इद्धः । शुक्रः । आहुतः । आ । हुतः ॥४॥

Samveda - Mantra Number : 4
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 1;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 1;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
( विपन्यया) कीत्तन से कीर्त्तित ( द्रविणस्युः) बल चाहता हुआ ( समिद्धः) सुलगाया हुआ (शुक्रः) श्वेत = प्रज्वलित होता हुआ (आहुतः) सब ओर से होमा हुआ ( अग्निः) अग्नि ( वृत्राणि) दुःखदायक रोगादिकों को ( जङ्घनत्) हनन करे ॥
आशय यह है कि वेदोक्त मन्त्रों से अग्नि का कीर्त्तन करना चाहिये इस से होम के साथ मन्त्र पढ़ने से तात्पर्य है । जिस से अग्नि के गुण ज्ञात होकर उस उपयोग की शिक्षा मिले। वह अग्नि बल को चाहता अर्थात् समिधा आदि द्वारा अपने को बढ़ाना चाहता है, उसे बढ़ना चाहिये, यह शिक्षा है । प्र०—अग्नि जड़ है उसमें चाहना नहीं बन सकती । उ०— भींत गिरना चाहती हैं, आग फूंकना चाहती है । जैसे यह व्यवहार है वैसे ही यहाँ भी जानो । जब वह अग्नि सुलगाया जाता है और प्रदीप्त होता है और चारों ओर से होम किया जाता है तब सब ओर के वृत्र अर्थात् अन्धकारों, दु:खदायक रोगों और अनावृष्ट्यादि दुःखों को हनन करता है, सो करे । इसलिये मनुष्यों को यज्ञ का अनुष्ठान करना चाहिये ॥
ईश्वर विषय में:— ( विपन्यया) स्तुति से ( द्रविणस्युः) भक्तों को आत्मिक बल का चाहने वाला (समिद्धः) अच्छे प्रकार ध्यान किया हुआ (शुक्रः) बलवान् और बलप्रदाता (आहुतः ) सर्वथा भक्ति किया हुआ (वृत्राणि) अविद्यादि अन्धकारों, दुःखों और दुःखसाधनों को (जंघनत्) हनन करे । इसलिये सबको नित्य परमात्मा की स्तुति प्रार्थना उपासना श्रद्धा भक्ति से करनी चाहिये ।
Footnote
निघण्टु ३ । १४ ॥ २ । ६ ॥ अष्टाध्यायी ७ । ४ । ३३ ॥ ७ । ४ । ३५ ॥ ७ । ४ । ३६ ॥ ३ । ४ । ७ ॥ ३ । २ । १६८ ॥ ३ । २। १७० के प्रमाण संस्कृतभाष्य में देखने चाहियें। यह ऋचा भी ऋ० ५ । १६ । ३४ में ठीक इसी प्रकार है ॥