Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 398

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- वसिष्ठो मैत्रावरुणिः Chhand- त्रिपदा विराडनुष्टुप् Swara- गान्धारः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
पि꣢बा꣣ सो꣡म꣢मिन्द्र꣣ म꣡न्द꣢तु त्वा꣣ यं꣡ ते꣢ सु꣣षा꣡व꣢ हर्य꣣श्वा꣡द्रिः꣢ । सो꣣तु꣢र्बा꣣हु꣢भ्या꣣ꣳ सु꣡य꣢तो꣣ ना꣡र्वा꣢ ॥३९८॥

पि꣡ब꣢꣯ । सो꣡म꣢꣯म् । इ꣣न्द्र । म꣡न्द꣢꣯तु । त्वा꣣ । य꣢म् । ते꣣ । सुषा꣡व꣢ । ह꣣र्यश्व । हरि । अश्व । अ꣡द्रिः꣢꣯ । अ । द्रिः꣣ । सोतुः꣢ । बा꣣हु꣡भ्या꣢म् । सु꣡य꣢꣯तः । सु । य꣣तः । न꣢ । अ꣡र्वा꣢꣯ ॥३९८॥

Mantra without Swara
पिबा सोममिन्द्र मन्दतु त्वा यं ते सुषाव हर्यश्वाद्रिः । सोतुर्बाहुभ्याꣳ सुयतो नार्वा ॥

पिब । सोमम् । इन्द्र । मन्दतु । त्वा । यम् । ते । सुषाव । हर्यश्व । हरि । अश्व । अद्रिः । अ । द्रिः । सोतुः । बाहुभ्याम् । सुयतः । सु । यतः । न । अर्वा ॥३९८॥

Samveda - Mantra Number : 398
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 1;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 5;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(हर्यश्व) हे हरणशील किरणों वाले ! (इन्द्र) विद्युत् ! वा सूर्य ! (सोतुः बाहुभ्याम्) सोमाऽभिषव करने वाले की बाहुओं से (अयम् अद्रिः) यह पाषाण [ग्रावा] (सोमम सुषाव) सोम को अभिषुत करता है। (न) जैसे (सुयतः अर्वा) सुशिक्षित घोड़ा [सारथि के हाथों से प्रेरणा किया हुआ अभीष्ट स्थान को पहुंचाता है तद्वत्]। उस सोम को (पिब) ग्रहण कर। वह सोम (त्वा) तुझे (मन्दतु) हृष्ट करे॥
मनुष्यों को योग्य है कि उत्तमोत्तम ग्रावों से सोमरस अभिपुत करके सूर्य के लिए होमें। इससे सूर्य को हर्ष-अनुकूलप्रवृत्ति होती है। धौर जिस प्रकार सुशिक्षित घोड़ा सारथि के हाथों से अभीष्ट मार्ग में प्रवृत्त रहता है, इसी प्रकार भले प्रकार के ग्रावा भी अभीष्ट उत्तम रस अभिषुत करते हैं। पत्थर के उन साधनों को ग्रावा कहते हैं जिनसे सोम अभिषुत होता है॥
Footnote
ऋ० ७। २२। १ में भी॥