Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 393

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- नृमेध आङ्गिरसः Chhand- उष्णिक् Swara- ऋषभः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
ए꣡न्द्र꣢ नो गधि प्रिय꣣ स꣡त्रा꣢जिदगोह्य । गि꣣रि꣢꣫र्न वि꣣श्व꣡तः꣢ पृ꣣थुः꣡ पति꣢꣯र्दि꣣वः꣢ ॥३९३॥

आ । इ꣣न्द्र । नः । गधि । प्रिय । स꣡त्रा꣢꣯जित् । स꣡त्रा꣢꣯ । जि꣣त् । अगोह्य । अ । गोह्य । गिरिः꣢ । न । वि꣣श्व꣡तः꣢ । पृ꣣थुः꣢ । प꣡तिः꣢꣯ । दि꣣वः꣢ ॥३९३॥

Mantra without Swara
एन्द्र नो गधि प्रिय सत्राजिदगोह्य । गिरिर्न विश्वतः पृथुः पतिर्दिवः ॥

आ । इन्द्र । नः । गधि । प्रिय । सत्राजित् । सत्रा । जित् । अगोह्य । अ । गोह्य । गिरिः । न । विश्वतः । पृथुः । पतिः । दिवः ॥३९३॥

Samveda - Mantra Number : 393
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 1;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 5;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(इन्द्र) विद्युत् ! (नः प्रियः) हमारे प्यारे ! (सत्राजित्) सब मेघों को जीतने वाले ! (अगोह्य) प्रकाशमय होने से छिपने योग्य ! (गिरिः न) मेघ के समान (विश्वतः पृथुः) सब ओर फैला हुआ (दिवः) अन्तरिक्ष का (पतिः) पालक तू (आ गधि) सब ओर व्यापता है॥
जड़सम्बोधन वेद की शैली है, यह बहुत बार व्याख्यात कर चुके हैं। गिरि मेघ का नाम है।
Footnote
निघण्टु १। १० ऋ० ८। ९८। ४ में “प्रियः सत्राजिदगोह्यः” पाठ है॥