Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 39

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- भर्गः प्रागाथः Chhand- बृहती Swara- मध्यमः Kaand Name- आग्नेयं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- आग्नेयं पर्व
Mantra with Swara
अ꣢ग्ने꣣ ज꣡रि꣢तर्वि꣣श्प꣡ति꣢स्तपा꣣नो꣡ दे꣢व र꣣क्ष꣡सः꣢ । अ꣡प्रो꣢षिवान्गृहपते म꣣हा꣡ꣳ अ꣢सि दि꣣व꣢स्पा꣣यु꣡र्दु꣢रोण꣣युः꣢ ॥३९॥

अ꣡ग्ने꣢꣯ । ज꣡रि꣢꣯तः । वि꣣श्प꣡तिः꣢ । त꣣पानः꣢ । दे꣣व । रक्ष꣡सः꣢ । अ꣡प्रो꣢꣯षिवान् । अ । प्रो꣣षिवान् । गृहपते । गृह । पते । महा꣢न् । अ꣣सि । दि꣣वः꣢ । पा꣣युः꣢ । दु꣣रोणयुः꣢ । दुः꣣ । ओनयुः꣢ । ॥३९॥

Mantra without Swara
अग्ने जरितर्विश्पतिस्तपानो देव रक्षसः । अप्रोषिवान्गृहपते महाꣳ असि दिवस्पायुर्दुरोणयुः ॥

अग्ने । जरितः । विश्पतिः । तपानः । देव । रक्षसः । अप्रोषिवान् । अ । प्रोषिवान् । गृहपते । गृह । पते । महान् । असि । दिवः । पायुः । दुरोणयुः । दुः । ओनयुः । ॥३९॥

Samveda - Mantra Number : 39
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 4;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 4;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(जरितः) सर्व पदार्थों के गुण बताने वाले ! (देव) अलौकिक ऐश्वर्य वाले ! (गृहपते) हमारे घरों के स्वामिन् ! (अग्ने) हे परमात्मन् ! आप (विश्पतिः) मनुष्यों के रक्षक और (रक्षसः, तपानः) राक्षसों के सन्तापक (अप्रोषिवान्) कभी प्रवास न करने वाले (दिवः) द्युलोकादि लोकों के (पायुः) रक्षक (दुरोणयुः) घर-घर में ओत-प्रोत और (महान्) पूजनीय (असि) हैं।
अर्थात् परमात्मा ऊपर कहे गुणों से युक्त सर्वकाल में सबका पूज्य है॥
भौतिक पक्ष में— (जरितः) वाणीरूप से वर्णन करने वाले ! (देव) ३३ देवों में एक ! (गृहपते) गार्हपत्य नाम (अग्ने) अग्ने ! तू (विश्पतिः) मनुष्यों का रक्षक (रक्षसः, तपानः) दुष्ट शत्रु का नाशक (अप्रोषिवान्) अग्न्यागार से अलग न करने योग्य (दिवः, पायु) प्रकाश का, रक्षक और (दुरोणयुः) घर-घर से मिला हुआ (महान्) हवन द्वारा प्रयोजनीय (असि) है॥
तात्पर्य यह है कि अग्नि वाणीरूप से प्रत्येक पदार्थ के गुणों का बखानने वाला, गार्हपत्य नाम एक देव है, जो अपने गुणों से मनुष्यों का रक्षक, रोगादि दुष्ट शत्रु का नाशक, सदा अग्न्यागार नाम कमरे में रक्खा हुआ, घर-घर में निरंन्तर रखने योग्य और हवनादि की रीति से नानाविध शिल्प का उपयोगी है॥ इसमें कई बार गृह शब्द के आने से यह भी सूचित होता है कि गृहस्थों का ही गार्हपत्य नाम अग्नि से विशेष सम्बन्ध है। ऐसा अन्य आश्रमों का नहीं [अग्नि से वाणी—देखो १ दशति ७ वें मन्त्र का भाष्य]॥
Footnote
निघं० ३। १६॥ २। ३॥ ३। १४॥ ३। ४ के प्रमाण संस्कृतभाष्य में देखिये॥ ऋग्वेद (८। ४९। १९) में “गृहपतिः” इतना पाठान्तर है॥५२॥