Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 385

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- विश्वमना वैयश्वः Chhand- उष्णिक् Swara- ऋषभः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
ए꣢दु꣣ म꣡धो꣢र्म꣣दि꣡न्त꣢रꣳ सि꣣ञ्चा꣡ध्व꣣र्यो꣣ अ꣡न्ध꣢सः । ए꣣वा꣢꣫ हि वी꣣र꣡स्तव꣢꣯ते स꣣दा꣡वृ꣢धः ॥३८५॥

आ꣢ । इत् । उ꣣ । म꣡धोः꣢꣯ । म꣣दि꣡न्त꣢रम् । सि꣣ञ्च꣢ । अध्व꣣र्यो । अ꣡न्ध꣢꣯सः । ए꣣व꣢ । हि । वी꣣रः꣢ । स्त꣡व꣢꣯ते । स꣣दा꣡वृ꣢धः । स꣣दा꣢ । वृ꣣धः ॥३८५॥

Mantra without Swara
एदु मधोर्मदिन्तरꣳ सिञ्चाध्वर्यो अन्धसः । एवा हि वीरस्तवते सदावृधः ॥

आ । इत् । उ । मधोः । मदिन्तरम् । सिञ्च । अध्वर्यो । अन्धसः । एव । हि । वीरः । स्तवते । सदावृधः । सदा । वृधः ॥३८५॥

Samveda - Mantra Number : 385
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 5;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 4;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(अध्वर्यो) हे यज्ञ के नेता ! (मधोः अन्धसः) मधुररसयुक्त हव्यान्न के (मदिन्तरम्) अति हर्ष वा पुष्टिकारक रस को (आ सिञ्च) होम कर (एवा हि) ऐसा करने से (सदावृधः) सदा बढ़ने वाला (वीरः) गतिशील विद्युत् (स्तवते) अर्चित होता अर्थात् उसका यजन होता है॥ (उ, इत्) ये दो पद निरुक्त १। ९ के अनुसार मिताक्षर ऋचाओं में पादपूर्ण हैं।
Footnote
“मधो” में नपुंसकलिङ्ग का व्यत्यय से पुल्लिङ्गवद्रूप हो गया॥ मदिन्तर में नकार का लोप आर्ष मान कर न हुआ और चारों पुस्तकों में नकारसहित ही पाठ देखा जाता है। वीरः यह विसर्ग सहित पाठ यद्यपि सामवेद के मूल पुस्तकों में नहीं देखा जाता परन्तु ऋग्वेद ८। २४। १६ में “मध्वः” तथा “सिञ्च वाध्वर्यो” और “वीरः” ये पाठ देखे जाते हैं और सामवेदस्थ सायरणभाष्य में भी “वीरः” पाठ की व्याख्या है, अतः हम भी “वीरः” पाठ ही निश्चित समझते हैं। स्तवते में विकरण का व्यत्यय है॥