Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 384

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- पर्वतः काण्वः Chhand- उष्णिक् Swara- ऋषभः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
य꣡त्सोम꣢꣯मिन्द्र꣣ वि꣡ष्ण꣢वि꣣ य꣡द्वा꣢ घ त्रि꣣त꣢ आ꣣प्त्ये꣢ । य꣡द्वा꣢ म꣣रु꣢त्सु꣣ म꣡न्द꣢से꣣ स꣡मिन्दु꣢꣯भिः ॥३८४॥

य꣢त् । सो꣡म꣢꣯म् । इ꣣न्द्र । वि꣡ष्ण꣢꣯वि । यत् । वा꣣ । घ । त्रिते꣢ । आ꣣प्त्ये꣢ । यत् । वा꣣ । मरु꣡त्सु꣢ । म꣡न्द꣢꣯से । सम् । इ꣡न्दु꣢꣯भिः ॥३८४॥

Mantra without Swara
यत्सोममिन्द्र विष्णवि यद्वा घ त्रित आप्त्ये । यद्वा मरुत्सु मन्दसे समिन्दुभिः ॥

यत् । सोमम् । इन्द्र । विष्णवि । यत् । वा । घ । त्रिते । आप्त्ये । यत् । वा । मरुत्सु । मन्दसे । सम् । इन्दुभिः ॥३८४॥

Samveda - Mantra Number : 384
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 5;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 4;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(इन्द्र) हे परमेश्वर ! (विष्णवि) सर्वव्यापक आप में (यत्सोमम्) जो अमृत है (घ) निश्चय (आप्त्ये) प्राप्त योगियों में हुए (त्रिते) इडा पिङ्गला सुषुम्णा के समुदाय में जो अमृत है (यद्वा) अथवा (मरुत्सु) प्राणों में जो अमृत है (यद्वा) अथवा अन्यत्र जहाँ-जहाँ अमृत है वहाँ-वहाँ (इन्दुभिः) अमृतों से, आप ही (सम् मन्दसे) भले प्रकार आनन्दित करते हैं।
अर्थात् जहाँ-जहाँ मनुष्य प्राणादि में अमृत पाता है वहाँ-वहाँ सब आप ही का आनन्द है॥
Footnote
ऋ० ८। १२। १६ में भी॥