Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 38

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- वसिष्ठो मैत्रावरुणिः Chhand- बृहती Swara- मध्यमः Kaand Name- आग्नेयं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- आग्नेयं पर्व
Mantra with Swara
त्वे꣡ अ꣢ग्ने स्वाहुत प्रि꣣या꣡सः꣢ सन्तु सू꣣र꣡यः꣢ । य꣣न्ता꣢रो꣣ ये꣢ म꣣घ꣡वा꣢नो꣣ ज꣡ना꣢नामू꣣र्वं꣡ दय꣢꣯न्त꣣ गो꣡ना꣢म् ॥३८॥

त्वे꣣ इति꣢ । अ꣣ग्ने । स्वाहुत । सु । आहुत । प्रिया꣡सः꣢ । स꣣न्तु । सूर꣡यः꣢ । य꣣न्ता꣡रः꣢ । ये । म꣣घ꣡वा꣢नः । ज꣡ना꣢꣯नाम् । ऊ꣣र्व꣢म् । दय꣢꣯न्त । गो꣡ना꣢꣯म् ॥३८॥

Mantra without Swara
त्वे अग्ने स्वाहुत प्रियासः सन्तु सूरयः । यन्तारो ये मघवानो जनानामूर्वं दयन्त गोनाम् ॥

त्वे इति । अग्ने । स्वाहुत । सु । आहुत । प्रियासः । सन्तु । सूरयः । यन्तारः । ये । मघवानः । जनानाम् । ऊर्वम् । दयन्त । गोनाम् ॥३८॥

Samveda - Mantra Number : 38
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 4;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 4;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(स्वाहुत) अच्छे प्रकार ध्यान किये हुए ! (अग्ने) हे ज्ञानस्वरूप ! (ये) जो लोग (त्वे) आपके (प्रियासः) प्यारे (सूरयः) स्तुतिकर्ता हैं, वे (मघवानः) विद्यादिधनयुक्त और (जनानां यन्तारः) मनुष्यों के नेता राजा वा उपदेष्टा (सन्तु) होवें और (गोनाम्) गौओं के (ऊर्वम्) बाहुल्य वा समूह को (दयन्त) रक्षित करें। जो लोग मनुष्यों के अग्रणी मुखिया उपदेष्टा वा राजा हों उन्हें ईश्वर का भक्त, ईश्वर का प्यारा, विद्यादिधनयुक्त और गौ आदि का रक्षक, होना चाहिए॥ भौतिक पक्ष में— (स्वाहुत) अच्छे प्रकार ग्राहुत ! (अग्ने) अग्ने ! (ये) जो लोग (त्वे) तेरे (प्रियासः) प्यारे हैं, वे (सूरयः) विद्वान् गुणज्ञ, (मघवानः) विद्यादिधनवान्, (जनानां, यन्तारः) मनुष्यों के नेता अग्रणी मुखिया उपदेष्टा वा राजा (सन्तु) हों और (गोनाम्) गौ आदि के (ऊर्वम्) समूह की (दयन्त) रक्षा करें॥ भावार्थ यह है कि जो मनुष्य अग्निविद्या के द्वारा अग्नि से उपयोग लेना जानते हैं, वे सर्वप्रिय, यज्ञशील, विद्वान्, धनवान्, मुखिया, अगुवा वा राजा और गवादि पशुओं के रक्षक होने चाहियें और होते हैं।
Footnote
अष्टाध्यायी ७। १। ३९॥ ७। १। ५०॥ ६। १। १०६॥ ८। २। ७६॥ ७। १। ५४॥ ७। १। ५६॥ ७। १। ५७ निघण्टु ३। १६॥ २। १०॥३। १ के प्रमाण संस्कृतभाष्य में देखिये॥ ऋग्वेद ७।१६।७ में भी ऐसा ही पाठ है॥