Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 37

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- शंयुर्बार्हस्पत्यः Chhand- बृहती Swara- मध्यमः Kaand Name- आग्नेयं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- आग्नेयं पर्व
Mantra with Swara
बृ꣣ह꣡द्भि꣢रग्ने अ꣣र्चि꣡भिः꣢ शु꣣क्रे꣡ण꣢ देव शो꣣चि꣡षा꣢ । भ꣣र꣡द्वा꣢जे समिधा꣣नो꣡ य꣢विष्ठ्य रे꣣व꣡त्पा꣢वक दीदिहि ॥३७॥

बृ꣣ह꣡द्भिः꣢ । अ꣣ग्ने । अ꣣र्चिभिः꣢ । शु꣣क्रे꣡ण꣢ । दे꣣व । शोचि꣡षा꣢ । भ꣣र꣡द्वा꣢जे । भ꣣र꣢त् । वा꣣जे । समिधानः꣢ । सम्꣣ । इधानः꣢ । य꣣विष्ठ्य । रेव꣢त् । पा꣣वक । दीदिहि ॥३७॥

Mantra without Swara
बृहद्भिरग्ने अर्चिभिः शुक्रेण देव शोचिषा । भरद्वाजे समिधानो यविष्ठ्य रेवत्पावक दीदिहि ॥

बृहद्भिः । अग्ने । अर्चिभिः । शुक्रेण । देव । शोचिषा । भरद्वाजे । भरत् । वाजे । समिधानः । सम् । इधानः । यविष्ठ्य । रेवत् । पावक । दीदिहि ॥३७॥

Samveda - Mantra Number : 37
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 4;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 4;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(देव) दिव्यैश्वर्य ! (यविष्ठ्य) सबसे बड़े ! (पावक) पवित्रकर्त्ता परमात्मन् ! आप (बृहद्भिः, अर्चिभिः) महान्, किरणरूप गुणों से (शुक्रेण, शोचिषा) शुद्ध, तेज के साथ (भरद्वाजे) पुरुषार्थी उपासक में (समिधानः) प्रकाश करते हुए (रेवत्) उसे विद्यादि धनयुक्त करते हुए (दीदिहि) प्रकाश कीजिए॥
भौतिक पक्ष में (देव) चमकते ! (यविष्ठ्य) दहकते ! (पावक) शोधक ! (अग्ने) ! अग्ने तू (बृहद्भिः, अर्चिभिः) भारी, लपटों से हुए (शुक्रेण, तेजसा) श्वेत तेज से (भरद्वाजे) स्थालीपाकादि अन्नवाले यजमान के यहां (समिधानः) प्रदीप्त होता हुआ (रेवत्) नानाविध धनादियुक्त करता हुआ (दीदिहि) सुलग॥
तात्पर्य यह है कि चमकता, दहकता, घर-द्वार आदि को शुद्ध करता, भारी लपटों वाला, उज्ज्वल, तेजस्वी, अग्नि, प्रत्येक यजमान के अग्न्यागार नामक [कमरे] स्थान में सुलगता रहना चाहिए। ऐसा करने से सर्व रोगादि की निवृत्ति होकर धनादि पपार्थों की वृद्धि होती है॥
Footnote
निघं० ३।३।२८॥ १।१७।२।९॥ २। ७।१।१६॥ के प्रमाण संस्कृतभाष्य में देखिये॥ ऋग्वेद (६।४८। ९) में चतुर्थपाद में केवल “रेवन्नः शुक्र दीदिहि द्युमत्पावक दीदिहि” इतना पाठान्तर है॥