Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 368

1875 Mantra
Devata- विश्वेदेवाः Rishi- त्रित आप्त्यः Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
अ꣣मी꣡ ये दे꣢꣯वा꣣ स्थ꣢न꣣ म꣢ध्य꣣ आ꣡ रो꣢च꣣ने꣢ दि꣣वः꣢ । क꣡द्ध꣢ ऋ꣣तं꣢꣫ कद꣣मृ꣢तं꣣ का꣢ प्र꣣त्ना꣢ व꣣ आ꣡हु꣢तिः ॥३६८॥

अ꣣मी꣡इति꣢ । ये दे꣣वाः । स्थ꣡न꣢꣯ । स्थ । न꣣ । म꣡ध्ये꣢꣯ । आ । रो꣣चने꣢ । दि꣣वः꣢ । कत् । वः꣣ । ऋत꣢म् । कत् । अ꣣मृ꣡त꣢म् । अ꣣ । मृ꣡त꣢꣯म् । का꣢ । प्र꣣त्ना꣢ । वः꣢ । आ꣡हु꣢꣯तिः । आ । हु꣣तिः ॥३६८॥

Mantra without Swara
अमी ये देवा स्थन मध्य आ रोचने दिवः । कद्ध ऋतं कदमृतं का प्रत्ना व आहुतिः ॥

अमीइति । ये देवाः । स्थन । स्थ । न । मध्ये । आ । रोचने । दिवः । कत् । वः । ऋतम् । कत् । अमृतम् । अ । मृतम् । का । प्रत्ना । वः । आहुतिः । आ । हुतिः ॥३६८॥

Samveda - Mantra Number : 368
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 3;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 2;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(अमी) ये (ये) जो (दिवः मध्ये आरोचने) आकाशगत प्रकाश में (देवाः) लोक (स्थन) हैं (वः) इनके मध्य में (कद् ऋतम्) क्या वेदवचन है ? (कद् अमृतम्) क्या यज्ञ की सामग्री है ? (वः) इनके मध्य में (का प्रत्ना आहुतिः) क्या सनातनी यज्ञक्रिया है ?
इस मन्त्र में यह प्रश्न है कि आकाशस्थ लोकलोकान्तरों में भी क्या वेद और यज्ञ का प्रचार है ? इसका उत्तर अगले मन्त्र में दिया है॥
Footnote
अष्टाध्यायी ७। १। ४५ का प्रमाण और ऋग्वेद० १। १०५। ५ का पाठभेद संस्कृतभाष्य में देखिये।
कोई लोग यह शंका करते हैं कि ऋग्वेद के मन्त्र सामवेद में देखे जाते हैं, इससे ऋग्वेद ही प्राचीन प्रतीत होता है और सामवेद नवीन। परन्तु यह ठीक नहीं है क्योंकि ऋग्वेद के १०। ८५। ११ (ऋक्सामाभ्यामभिहितो गावौ०) इत्यादि स्थलों में सामवेद का नाम उपस्थित है॥