Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 362

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- प्रियमेध आङ्गिरसः Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
अ꣡र्च꣢त꣣ प्रा꣡र्च꣢ता नरः꣣ प्रि꣡य꣢मेधासो꣣ अ꣡र्च꣢त । अ꣡र्च꣢न्तु पुत्र꣣का꣢ उ꣣त꣢꣫ पुर꣣मि꣢द्धृ꣣꣬ष्ण्व꣢꣯र्चत ॥३६२॥

अ꣡र्च꣢꣯त । प्र । अ꣣र्चत । नरः । प्रि꣡य꣢꣯मेधासः । प्रि꣡य꣢꣯ । मे꣣धासः । अ꣡र्च꣢꣯त । अ꣡र्च꣢꣯न्तु । पु꣣त्रकाः꣢ । पु꣣त् । त्रकाः꣢ । उ꣣त꣢ । पु꣡र꣢꣯म् । इत् । धृ꣣ष्णु꣢ । अ꣣र्चत ॥३६२॥

Mantra without Swara
अर्चत प्रार्चता नरः प्रियमेधासो अर्चत । अर्चन्तु पुत्रका उत पुरमिद्धृष्ण्वर्चत ॥

अर्चत । प्र । अर्चत । नरः । प्रियमेधासः । प्रिय । मेधासः । अर्चत । अर्चन्तु । पुत्रकाः । पुत् । त्रकाः । उत । पुरम् । इत् । धृष्णु । अर्चत ॥३६२॥

Samveda - Mantra Number : 362
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 3;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 2;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
परमात्मा उपदेश करता है कि (नरः) हे नेता मनुष्यो ! (प्रियमेधासः) हे यज्ञ से प्यार करने वालो ! (पुरम्) यजन करने वालों का इष्ट पूर्ण करने वाले (उत) और (धृष्णु) सबको दबा सकने और स्वयं न दबने वाले इन्द्र का (अर्चत प्रार्चत) यजन करो, यजन करो, बहुत यजन करो, (पुत्रकाः) हे पुत्रो ! (अर्चन्तु) यजन करो (इत्) अवश्य (अर्चत) यजन करो॥
बहुत बार यजन करो, कहना उसकी अत्यन्त आवश्यक विधि का द्योतक है। इन्द्र शब्द से परमात्मा और सूर्य वा विद्युत् का ग्रहण है॥
Footnote
ऋ० ८। ६९। ८ में जो पाठभेद है वह संस्कृतभाष्य में देखिये॥