Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 360

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- प्रियमेध आङ्गिरसः Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
प्र꣡प्र꣢ वस्त्रि꣣ष्टु꣢भ꣣मि꣡षं꣢ व꣣न्द꣡द्वी꣢रा꣣ये꣡न्द꣢वे । धि꣣या꣡ वो꣢ मे꣣ध꣡सा꣢तये꣣ पु꣢र꣣न्ध्या꣡ वि꣢वासति ॥३६०॥

प्र꣡प्र꣢꣯ । प्र । प्र꣣ । वः । त्रिष्टु꣢भ꣢म् । त्रि꣣ । स्तु꣡भ꣢꣯म् । इ꣡ष꣢꣯म् । व꣣न्दद्वी꣡रा꣣य । व꣣न्द꣢त् । वी꣣राय । इ꣡न्द꣢꣯वे । धि꣣या꣢ । वः꣣ । मेध꣡सा꣢तये । मे꣣ध꣢ । सा꣣तये । पु꣡र꣢꣯न्ध्या । पु꣡र꣢꣯म् । ध्या꣣ । आ꣢ । वि꣣वासति । ॥३६०॥

Mantra without Swara
प्रप्र वस्त्रिष्टुभमिषं वन्दद्वीरायेन्दवे । धिया वो मेधसातये पुरन्ध्या विवासति ॥

प्रप्र । प्र । प्र । वः । त्रिष्टुभम् । त्रि । स्तुभम् । इषम् । वन्दद्वीराय । वन्दत् । वीराय । इन्दवे । धिया । वः । मेधसातये । मेध । सातये । पुरन्ध्या । पुरम् । ध्या । आ । विवासति । ॥३६०॥

Samveda - Mantra Number : 360
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 3;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 2;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
हे यजमानो ! और ऋत्विजो ! तुम (वन्दद्वीराय) वीरवन्दित (इन्दवे) वर्षा से पृथिवी के भिगोने वाले इन्द्र के लिये (त्रिष्टुभम्) ३ स्तोभों वाले साम का (प्र) गान करो और (इषम्) सोमादि अन्न की आहुति (प्र) दो। वह (धिया) कर्म से (वः) तुम को तथा (पुरन्धी) आकाश और पृथिवी को (मेधसातये) यज्ञ बाँटने के लिये (आ-विवासति) सब ओर से सेवित करता है।
Footnote
सामों में स्तोभादि सुने जाते हैं। उनके बनाने को ही विकार, विश्लेष विकर्षण, विराम, अभ्यास, लोप, आगम और स्तोभादि किये जाते हैं। साम विधान ब्राह्मण (१। १। ४) में कहा है कि “इस साम की ऋचा ही हड्डियाँ हैं, स्वर माँस हैं और स्तोम रोम हैं” और वह स्तोम ३ प्रकार का है — पदस्तोभ, वाक्यस्तोभ और अक्षरस्तोभ। जिसमें पदस्तोम १५ प्रकार के “हाउ” कार आदि मन्त्रब्राह्मण (३।१३) में कहे हैं। वाक्यस्तोभ आशस्ति, स्रुति, संख्यान, प्रलय, परिदेवन, प्रैष, अन्वेषण, सृष्टि और आख्यान; ये ९ हैं। और वर्णस्तोभ तो गानग्रन्थ में सर्वत्र ही हैं। तथा च इसी ऋचा में —(मेधसातये) इसके वामदेव्यगान में (मेघसा १ ता ३ याइ) इत्यादि देखिये॥
निघण्टु ३। ७॥ २। १७॥ ३। ३०॥ २। १॥ ३। ५ निरुक्त ८।४१ इत्यादि के प्रमाण संस्कृतभाष्य में देखिये॥
ऋ० ८। ६९। १ में “मन्दद्वीराय” पाठ है॥