Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 358

1875 Mantra
Devata- दधिक्रा Rishi- वामदेवो गौतमः Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
द꣣धिक्रा꣡व्णो꣢ अकारिषं जि꣣ष्णो꣡रश्व꣢꣯स्य वा꣣जि꣡नः꣢ । सु꣣रभि꣢ नो꣣ मु꣡खा꣢ कर꣣त्प्र꣢ न꣣ आ꣡यू꣢ꣳषि तारिषत् ॥३५८॥

द꣣धिक्रा꣡व्णः꣢ । द꣣धि । क्रा꣡व्णः꣢꣯ । अ꣣कारिषम् । जिष्णोः꣢ । अ꣡श्व꣢꣯स्य । वा꣣जि꣡नः꣢ । सु꣣रभि꣢ । सु꣣ । रभि꣢ । नः꣣ । मु꣡खा꣢꣯ । मु । खा꣣ । करत् । प्र꣢ । नः꣢ । आ꣡यूँ꣢꣯षि । ता꣣रिषत् ॥३५८॥

Mantra without Swara
दधिक्राव्णो अकारिषं जिष्णोरश्वस्य वाजिनः । सुरभि नो मुखा करत्प्र न आयूꣳषि तारिषत् ॥

दधिक्राव्णः । दधि । क्राव्णः । अकारिषम् । जिष्णोः । अश्वस्य । वाजिनः । सुरभि । सु । रभि । नः । मुखा । मु । खा । करत् । प्र । नः । आयूँषि । तारिषत् ॥३५८॥

Samveda - Mantra Number : 358
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 2;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 1;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
हे योगविद्यादि ऐश्वर्यशाली ! महात्मन् ! आपके उपदेश से मैं (जिष्णोः) जयशील (अश्वस्य) शीघ्रगामी (वाजिनः) बलवान् (दधिक्राव्णः) दधिक्रावा नाम अग्नि की [परिचर्या] (अकारिषम्) करू जिससे वह (नः) हमारे (मुखा) मुखादि अङ्गों को (सुरभि) सुगन्धयुक्त (करत्) करे और (नः) हमारी (आयूंषि) आयुओं को (प्रतारिषत्) बढ़ावे॥
Footnote
निघण्टु १। १४ में दधिक्रावा नाम अश्व का है और यथार्थ में दधिक्रावा नामक अग्नि देवतों का अश्व और स्वयं भी देवता है। निरुक्त २। २७ के अनुसार दधिक्रावा का अर्थ यह है कि जो धारण करे हुए ले चले। सो अग्नि देवतों के हव्य पदार्थों को भी लेकर चलता है और वायु आदि कितने ही देवतों को भी लेकर आकाश में चलता है। इस पर सायणाचार्य भी कहते हैं कि (“अग्नि देवतों के लिए छिप जाता है और उनके अश्व का काम देता है” इत्यादि शतपथ [अध्वर्यु] ब्राह्मण की सङ्गति लगानी चाहिए)॥ ऋ० ४। ३९। ६ में भी॥७॥