Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 35

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- शंयुर्बार्हस्पत्यः Chhand- बृहती Swara- मध्यमः Kaand Name- आग्नेयं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- आग्नेयं पर्व
Mantra with Swara
य꣣ज्ञा꣡य꣢ज्ञा वो अ꣣ग्न꣡ये꣢ गि꣣रा꣡गि꣢रा च꣣ द꣡क्ष꣢से । प्र꣡प्र꣢ व꣣य꣢म꣣मृ꣡तं꣢ जा꣣त꣡वे꣢दसं प्रि꣣यं꣢ मि꣣त्रं꣡ न श꣢꣯ꣳसिषम् ॥३५॥

य꣣ज्ञा꣡य꣢ज्ञा । य꣣ज्ञा꣢ । य꣣ज्ञा꣢ । वः । अग्न꣡ये꣢ । गि꣣रा꣡गि꣢रा । गि꣣रा꣢ । गि꣣रा । च । द꣡क्ष꣢꣯से । प्र꣡प्र꣢꣯ । प्र । प्र꣣ । वयम्꣢ । अ꣣मृ꣡तम्꣢ । अ꣣ । मृ꣡तम्꣢꣯ । जा꣣त꣡वे꣢दसम् । जा꣣त꣢ । वे꣣दसम् । प्रियम्꣢ । मि꣣त्रम्꣢ । मि꣣ । त्रम्꣢ । न । शँ꣣सिषम् ॥३५॥

Mantra without Swara
यज्ञायज्ञा वो अग्नये गिरागिरा च दक्षसे । प्रप्र वयममृतं जातवेदसं प्रियं मित्रं न शꣳसिषम् ॥

यज्ञायज्ञा । यज्ञा । यज्ञा । वः । अग्नये । गिरागिरा । गिरा । गिरा । च । दक्षसे । प्रप्र । प्र । प्र । वयम् । अमृतम् । अ । मृतम् । जातवेदसम् । जात । वेदसम् । प्रियम् । मित्रम् । मि । त्रम् । न । शँसिषम् ॥३५॥

Samveda - Mantra Number : 35
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 4;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 4;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
हे [मनुष्यो !] (वयम्) हम (वः) तुम्हारे (यज्ञा यज्ञा) यज्ञ यज्ञ में और (गिरा गिरा च) वाणी वाणी [ऋचा ऋचा] से (अग्नये) ज्ञानस्वरूप (दक्षसे) महान् (अमृतम्) अमर (जातवेदसम्) वेदप्रकाशक [परमात्मा अपने आप] को (प्रियं, मित्रं न) प्यारे, मित्र के समान (प्र प्र शंसिषम्) उपदेश करते हैं।
परमात्मा उपदेश करते हैं कि हम तुम्हारे समस्त ज्ञानयज्ञों में समस्त वेदमन्त्रों से तुम्हें अपना उपदेश करते हैं अर्थात् अपने ज्ञानस्वरूप, महान् अमर वेदप्रकाशक ईश्वरभाव को जताते हैं॥
भौतिक पक्ष में: — (वयम्) हम (वः) तुम्हारे (यज्ञा यज्ञा) यज्ञ-यज्ञ में (गिरा गिरा च) और मन्त्र-मन्त्र से (दक्षसे) बड़े भारी (अमृतम्) देव (जातवेदसम्) बुद्धिप्रसारक (अग्नये) अग्नि को (प्रियं, मित्रं न) प्रिय, मित्र के समान (प्र, प्र शंसिषम्) बताते हैं॥
अर्थात् परमात्मा वताते हैं कि हे मनुष्यो ! तुम्हारे यज्ञ यज्ञ में हम ऋचा-ऋचा से तुमको यह बताते हैं कि अग्नि महान्, देव, बुद्धिप्रसारक है, उससे उपयोग ली, यह तुम्हारा हितसाधक मित्र के समान है।
Footnote
अष्टाध्यायी ८। १। ६ का प्रमाण संस्कृतभाष्य में देखिये॥ ऋग्वेद ६। ४८। १ में भी ऐसा ही पाठ है॥