Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 349

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- तिरश्चीराङ्गिरसः Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
आ꣢ त्वा꣣ गि꣡रो꣢ र꣣थी꣢रि꣣वा꣡स्थुः꣢ सु꣣ते꣡षु꣢ गिर्वणः । अ꣣भि꣢ त्वा꣣ स꣡म꣢नूषत꣣ गा꣡वो꣢ व꣣त्सं꣢꣫ न धे꣣न꣡वः꣢ ॥३४९॥

आ꣢ । त्वा꣣ । गि꣡रः꣢꣯ । र꣣थीः꣢ । इव । अ꣡स्थुः꣢꣯ । सु꣣ते꣡षु꣢ । गि꣣र्वणः । गिः । वनः । अभि꣢ । त्वा꣣ । स꣢म् । अ꣣नूषत । गा꣡वः꣢꣯ । व꣣त्स꣢म् । न । धे꣣न꣡वः꣢ ॥३४९॥

Mantra without Swara
आ त्वा गिरो रथीरिवास्थुः सुतेषु गिर्वणः । अभि त्वा समनूषत गावो वत्सं न धेनवः ॥

आ । त्वा । गिरः । रथीः । इव । अस्थुः । सुतेषु । गिर्वणः । गिः । वनः । अभि । त्वा । सम् । अनूषत । गावः । वत्सम् । न । धेनवः ॥३४९॥

Samveda - Mantra Number : 349
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 1;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 3; Khand » 12;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
पूर्व मन्त्र की अनुवृत्ति से हे राजन् ! उक्त प्रकार प्रजा को सुख देने का फल यह है कि — (सुतेषु) पुत्रतुल्य प्रजाजनों में (गिरः) उन की प्रशंसायुक्त वाणी (त्वा) आप को (रथीरिव) जैसे रथी शीघ्र चलता है वैस (आ-अस्थुः) सब ओर से आकर उपस्थित होती हैं (गिर्वणः) हे वाणी से सेवनीय ! (त्वा) आपकी (अभि) और देख कर (समनूषत) सब भले प्रकार प्रशंसा करते हैं। दृष्टान्त — (न) जैसे (धेनवः) दुधारु (गावः) गौवें (वत्सम्) बछड़े को देखकर प्रीति से रंभाती हैं तद्वत्॥
Footnote
ऋ० ८। ९५। १ में “समनूषतेन्द्र वत्सं न मातरः” इतना अन्तर है॥