Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 34

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- उशना काव्यः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- आग्नेयं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- आग्नेयं पर्व
Mantra with Swara
क꣡स्य꣢ नू꣣नं꣡ प꣢꣯रीणसि꣣ धि꣡यो꣢ जिन्वसि सत्पते । गो꣡षा꣢ता꣣ य꣡स्य꣢ ते꣣ गि꣡रः꣢ ॥३४॥

क꣡स्य꣢꣯ । नू꣣न꣢म् । प꣡री꣢꣯णसि । प꣡रि꣢꣯ । न꣣सि । धि꣡यः꣢꣯ । जि꣣न्वसि । सत्पते । सत् । पते । गो꣡षा꣢꣯ता । गो꣢ । सा꣣ता । य꣡स्य꣢꣯ । ते꣣ । गि꣡रः꣢꣯ ॥३४॥

Mantra without Swara
कस्य नूनं परीणसि धियो जिन्वसि सत्पते । गोषाता यस्य ते गिरः ॥

कस्य । नूनम् । परीणसि । परि । नसि । धियः । जिन्वसि । सत्पते । सत् । पते । गोषाता । गो । साता । यस्य । ते । गिरः ॥३४॥

Samveda - Mantra Number : 34
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 3;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 3;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(सत्पते) हे सन्तों के रक्षक ! (यस्य) जिस की (गिरः) वाणी (ते) आपके विषय में (गोषाताः) अमृतभरी हैं, उसके लिये (कस्य) सुख की (परीणसि) बहुत-सी (धियः) बुद्धियों को (जिन्वसि) भरपूर कर देते हो॥
अर्थात् जो मनुष्य परमात्मा के भक्त हैं और अमृतभरी वाणी से परमात्मा का गुणगान करते हैं, उन्हें वह भक्तपरिपालक जगदीश सुख देने वाली बुद्धि से भरपूर कर देते हैं॥
भौतिक पक्ष में: — (सत्पते) यज्ञकर्त्ताओं के पालक ! अग्ने (यस्य) जिसकी (गिरः) वाणी (ते) तेरे विषय (गोषाताः) सोमादि औषधियों का विभाग करने वाली हैं उसको तू (कस्य) सुख की (परीणसि) बहुत-सी (धियः) बुद्धियों को (जिन्वसि) प्राप्त कर देता है॥
अर्थात् अग्नि यज्ञकर्त्ताओं का पालक—रक्षक है, वह उस मनुष्य के बुद्धितत्त्व को बढ़ाता है और पुष्ट शुद्ध करता है जो सोमादि का होम और अग्न्यादि देवों के गुणवर्णनपूर्वक यज्ञ करता है। क्योंकि अग्नि में होम करने से वायु आदि की शुद्धि, उससे अन्नादि भोज्य पेय पदार्थों का शोधन, उससे शरीरस्थ सांख्यप्रतिपादित बुद्धितत्त्व का परिशोधन वृद्धि और आप्यायन होता है। यह जानना सुगम ही है॥
Footnote
निघण्टु ३। ६॥ ३। १॥ ३। ९ के प्रमाण संस्कृतभाष्य में देखिये॥ ऋग्वेद ८। ७३। ७ में तो परीणसि = परीणसः। सत्पते = दम्पते, पाठ है॥