Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 33

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- सिन्धुद्वीप आम्बरीषः, त्रित आप्त्यो वा Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- आग्नेयं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- आग्नेयं पर्व
Mantra with Swara
शं꣡ नो꣢ दे꣣वी꣢र꣣भि꣡ष्ट꣢ये꣣ शं꣡ नो꣢ भवन्तु पी꣣त꣡ये꣢ । शं꣢꣫ योर꣣भि꣡ स्र꣢वन्तु नः ॥३३॥

श꣢म् । नः꣢ । देवीः꣢ । अ꣣भि꣡ष्ट꣢ये । शम् । नः꣣ । भवन्तु । पीत꣡ये꣢ । शम् । योः । अ꣣भि꣢ । स्र꣣वन्तु । नः ॥३३॥

Mantra without Swara
शं नो देवीरभिष्टये शं नो भवन्तु पीतये । शं योरभि स्रवन्तु नः ॥

शम् । नः । देवीः । अभिष्टये । शम् । नः । भवन्तु । पीतये । शम् । योः । अभि । स्रवन्तु । नः ॥३३॥

Samveda - Mantra Number : 33
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 3;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 3;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(देवीः) परमात्मा की दिव्य शक्तियें (नः) हमारे (अभिष्टये) मनचाहे आनन्द के लिये (शम्) सुखदात्री (भवन्तु) होवें। (नः) हमारी (पीतये) तृप्ति के लिये (शम्) सुखदा होवें। किन्तु (नः) हमारे लिये (शंयोः) अभीष्ट सुख को (अभि-स्त्रवन्तु) वर्षावें।
परमात्मा की स्तुति उपासना का फलस्वरूप आशिष इस मन्त्र में मांगा गया है कि उसकी कृपा से हमें सब प्रकार सदा सुख मिले॥
भौतिक पक्ष में भी: — (देवी) अग्नि आदि की दिव्यशक्तियां जानी हुई हम को सब प्रकार सदा सुखदायिनी हो सकती हैं। इसके लिये हम को सूर्यादि देवों की क्या-क्या शक्ति = सामर्थ्य है, इस बात के जानने के लिये उस-उस पदार्थ के गुणों का वर्णन यजन — मिलान करना चाहिये॥ 'ऋग्वेद १०। ९। ४ में “शन्नो” के स्थान में “आपो” ऐसा पाठ है और तदनुसार “आपोदेवता” है। परन्तु यहां पाठ में “आपः” न होने से तथा आग्नेयपर्व के प्रकरण से अग्नि देवता की ही अनुवृत्ति जाननी चाहिये॥
Footnote
निघं० ३। ६॥ ५। ६॥ ४। १ अष्टाध्यायी ३। ३। ९५॥ ६।४। ६५-६६ के प्रमाण संस्कृतभाष्य में देखिये।