Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 325

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- बृहदुक्थ्यो वामदेव्यः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
वि꣣धुं꣡ द꣢द्रा꣣ण꣡ꣳ सम꣢꣯ने बहू꣣ना꣡ꣳ युवा꣢꣯न꣣ꣳ स꣡न्तं꣢ पलि꣣तो꣡ ज꣢गार । दे꣣व꣡स्य꣢ पश्य꣣ का꣡व्यं꣢ महि꣣त्वा꣢꣫द्या म꣣मा꣢र꣣ स꣡ ह्यः समा꣢꣯न ॥३२५॥

वि꣣धु꣢म् । वि꣣ । धु꣢म् । द꣣द्राण꣢म् । स꣡म꣢꣯ने । सम् । अ꣣ने । बहूना꣢म् । यु꣡वा꣢꣯नम् । स꣡न्त꣢꣯म् । प꣣लितः꣢ । ज꣣गार । देव꣡स्य꣢ । प꣣श्य । का꣡व्य꣢꣯म् । म꣣हित्वा꣢ । अ꣣द्या꣢ । अ꣣ । द्य꣢ । म꣣मा꣡र꣢ । सः । ह्यः । सम् । आ꣣न ॥३२५॥

Mantra without Swara
विधुं दद्राणꣳ समने बहूनाꣳ युवानꣳ सन्तं पलितो जगार । देवस्य पश्य काव्यं महित्वाद्या ममार स ह्यः समान ॥

विधुम् । वि । धुम् । दद्राणम् । समने । सम् । अने । बहूनाम् । युवानम् । सन्तम् । पलितः । जगार । देवस्य । पश्य । काव्यम् । महित्वा । अद्या । अ । द्य । ममार । सः । ह्यः । सम् । आन ॥३२५॥

Samveda - Mantra Number : 325
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 4;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 3; Khand » 10;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
तो फिर मित्रों को मरवा कर विजय से क्या लाभ है ? इसके उत्तर में कहते हैं कि — हे राजन् ! (दद्राणम्) शीघ्रगामी (बहूनाम्) बहुत तारों के बीच में (युवानम्) जवान नवीन वा अधिक तेज़ोधारी (सन्तम्) वर्तमान चन्द्रमा को (पलितः) बूढ़ा सूर्य (जगार) निगल जाता है, उसके ऊपर के प्रकाश को अपने में संहार कर लेता है, इसी प्रकार (समने) संग्राम में (यः) जो (ह्यः) कल (ममार) मरा है (सः) वह (अद्य) आज (समान) भले प्रकार जीता है (देवस्य) परमेश्वर के (काव्यम्) चातुर्य को (महित्वा) गहरे भाव से (पश्य) देख॥
अर्थात् धर्मानुसार युद्ध में मरे हुओं का शोक नहीं करना। परमेश्वर की लीला को देखो कि बड़ा बूढ़ा सूर्य, जवान (छोटे) शीघ्रगामी चन्द्रमा के प्रकाश को निगल जाता है, अगले दिन फिर उसकी कला पूरी हो जाती हैं। इसी प्रकार जो शूरवीर आज मृत्यु को प्राप्त हुए हैं वे कल जन्मान्तर धारण करके अपने किये धर्म का उत्तम फल भोगेंगे। इनका शोक न करना चाहिये॥
Footnote
निरुक्त परिशिष्ट २। २८ में इसका यह अर्थं लिखा है कि——“विधमनशील और दमनशील चन्द्रमा को बूढ़ा सूर्य निगलता है। वह कल मरा, आज फिर उग आता है। यह आधिदैवत हुआ।। अव अध्यात्म सुनिये—विधमनशील और दमनशील युवा महत्तत्त्व को बूढ़ा आत्मा निगल जाता है। यह रात्रि में मर जाता और अगले दिन फिर जाग उठाता है। यह आध्यात्मिक अर्थ है।”
इस निरुक्त के परिशिष्ट की शैली स्पष्ट नवीन प्रतीत होती है।
निघण्टु २। १७॥ ३। १५ इत्यादि के प्रमाण संस्कृतभाष्य में देखिये॥ ऋ० १०। ५५। ५ में भी॥ ३॥