Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 319

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- गौरिवीतिः शाक्त्यः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
व꣡यः꣢ सुप꣣र्णा꣡ उ꣢꣯प सेदु꣣रि꣡न्द्रं꣢ प्रि꣣य꣡मे꣢धा꣣ ऋ꣡ष꣢यो꣣ ना꣡ध꣢मानाः । अ꣡प꣢ ध्वा꣣न्त꣡मू꣢र्णु꣣हि꣢ पू꣣र्धि꣡ चक्षु꣢꣯र्मुमु꣣ग्ध्या꣢३꣱स्मा꣢न्नि꣣ध꣡ये꣢व ब꣣द्धा꣢न् ॥३१९॥

व꣡यः꣢꣯ । सु꣣पर्णाः । सु꣣ । पर्णाः꣢ । उ꣡प꣢꣯ । से꣣दुः । इ꣡न्द्र꣢꣯म् । प्रि꣣य꣡मे꣢धाः । प्रि꣣य꣢ । मे꣣धाः । ऋ꣡ष꣢꣯यः । ना꣡ध꣢꣯मानाः । अ꣡प꣢꣯ । ध्वा꣣न्त꣢म् । ऊ꣣र्णुहि꣢ । पू꣣र्धि꣢ । च꣡क्षुः꣢ । मु꣣मुग्धि꣢ । अ꣣स्मा꣢न् । नि꣣ध꣡या꣢ । नि꣣ । ध꣡या꣢꣯ । इ꣣व । बद्धा꣢न् ॥३१९॥

Mantra without Swara
वयः सुपर्णा उप सेदुरिन्द्रं प्रियमेधा ऋषयो नाधमानाः । अप ध्वान्तमूर्णुहि पूर्धि चक्षुर्मुमुग्ध्या३स्मान्निधयेव बद्धान् ॥

वयः । सुपर्णाः । सु । पर्णाः । उप । सेदुः । इन्द्रम् । प्रियमेधाः । प्रिय । मेधाः । ऋषयः । नाधमानाः । अप । ध्वान्तम् । ऊर्णुहि । पूर्धि । चक्षुः । मुमुग्धि । अस्मान् । निधया । नि । धया । इव । बद्धान् ॥३१९॥

Samveda - Mantra Number : 319
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 3;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 3; Khand » 9;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(वयः) पक्षितुल्य (सुपर्णाः) सूर्य किरण (इन्द्रम्) सूर्य को (उप सेदुः) जैसे आश्रय करती हैं। वैसे ही (प्रियमेधाः) यज्ञादि कर्म जिन्हें प्यारा है वे (ऋषयः) ऋषि लोग इन्द्र अर्थात् राजा को (नाधमानाः) याचना करते हैं कि (ध्वान्तम्) अन्धकार अन्याय को (अप ऊर्णुहि) दूर कीजिये (चक्षुः पूर्धि) न्याय प्रकाश कीजिये (निधयेव) जैसे पाश-समूह से (बद्धान्) बन्धे हुए (अस्मान्) हमको (मुमुग्धि) छुड़ाइये॥
ईश्वर पक्ष में — (वयः) गति वाले (सुपर्णाः) जीवात्मा पक्षी (प्रियमेधाः) जिन्हें यज्ञ प्यारा है वे (ऋषयः) ऋषि (इन्द्रम्) परमेश्वर को (नाधमानाः) प्रार्थना करते हुए (उपसेदुः) आश्रित होते हैं कि — (ध्वान्तम्) अज्ञानान्धकार की (अप-ऊर्णुहि) दूर कीजिये और (चक्षुः पूर्धि) ज्ञान का प्रकाश कीजिये (निधयेव) जैसे फांसियों के समूह से (बद्धान्) बच्चों को तद्वत् मोहबद्ध (अस्मान्) हम को (मुमुग्धि) मुक्त कीजिये॥
Footnote
निरुक्त ४।२॥ ४।३ निघण्टु ३। १७ के प्रमाण संस्कृतभाष्य में देखिये॥ ॠग्वेद १०। ७३। ११ में भी॥