Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 316

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- पृथुर्वैन्यः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
सु꣣ष्वाणा꣡स꣢ इन्द्र स्तु꣣म꣡सि꣢ त्वा सनि꣣ष्य꣡न्त꣢श्चित्तुविनृम्ण꣣ वा꣡ज꣢म् । आ꣡ नो꣢ भर सुवि꣣तं꣡ यस्य꣢꣯ को꣣ना꣢꣫ तना꣣ त्म꣡ना꣢ सह्यामा꣣त्वो꣡ताः꣢ ॥३१६॥

सु꣣ष्वाणा꣡सः꣢ । इ꣣न्द्र । स्तुम꣡सि꣢ । त्वा꣣ । सनिष्य꣡न्तः꣢ । चि꣣त् । तुविनृम्ण । तुवि । नृम्ण । वा꣡ज꣢꣯म् । आ । नः꣣ । भर । सुवित꣢म् । य꣡स्य꣢꣯ । को꣣ना꣢ । त꣡ना꣢꣯ । त्म꣡ना꣢꣯ । स꣣ह्याम । त्वो꣡ताः꣢꣯ । त्वा । उ꣣ताः ॥३१६॥

Mantra without Swara
सुष्वाणास इन्द्र स्तुमसि त्वा सनिष्यन्तश्चित्तुविनृम्ण वाजम् । आ नो भर सुवितं यस्य कोना तना त्मना सह्यामात्वोताः ॥

सुष्वाणासः । इन्द्र । स्तुमसि । त्वा । सनिष्यन्तः । चित् । तुविनृम्ण । तुवि । नृम्ण । वाजम् । आ । नः । भर । सुवितम् । यस्य । कोना । तना । त्मना । सह्याम । त्वोताः । त्वा । उताः ॥३१६॥

Samveda - Mantra Number : 316
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 3;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 3; Khand » 9;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(इन्द्र) हे राजन् ! (सुष्वाणासः) सोमादि को उत्पन्न करते हुए (चित्) और (वाजम्) धान्यादि का (सनिष्यन्तः) न्यायपूर्वक विभाग करते हुए हम (त्वा) आपकी (स्तुममि) स्तुति करते हैं (तुविनृम्ण) हे बहुबल वा बहुधन ! (त्वोताः) आपसे रक्षा किये हुए हम (यस्य) जिस धनादि की (कोना) कामना करें उस (सुवितम्) प्राप्त करने योग्य धनादि को (नः) हमारे लिये (आभर) प्राप्त कराइये। (तना) विस्तृत धनों को (त्मना) अपने ही द्वारा हम (सह्याम) यापकी कृपा से पावें॥
खेती, बाड़ी, घन, धान्यादि सब पदार्थों की रक्षापूर्वक उत्पत्ति और न्यायपूर्वक विभाग, राजा ही के होते हुए होता है। अन्यथा परस्पर भक्ष्य भक्षक बनकर नष्ट हो जावें। इसलिये मनुष्यों को न्यायकारी राजा की इच्छा करनी चाहिये॥
Footnote
अष्टाध्यायी ६। ४। १४१। सायणाचार्य। निघण्टु २। १० और ऋग्वेद १०। १४८। १ का पाठस्थभेद संस्कृतभाष्य में देखिये॥