Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 315

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- गातुरात्रेयः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
अ꣡द꣢र्द꣣रु꣢त्स꣣म꣡सृ꣢जो꣣ वि꣢꣫ खानि꣣ त्व꣡म꣢र्ण꣣वा꣡न्ब꣢द्बधा꣣ना꣡ꣳ अ꣢रम्णाः । म꣣हा꣡न्त꣢मिन्द्र꣣ प꣡र्व꣢तं꣣ वि꣢꣫ यद्वः सृ꣣ज꣢꣫द्धा꣣रा अ꣢व꣣ य꣡द्दा꣢न꣣वा꣢न्हन् ॥३१५॥

अ꣡द꣢꣯र्दः । उ꣡त्स꣢꣯म् । उत् । स꣣म् । अ꣡सृ꣢꣯जः । वि । खा꣡नि꣢꣯ । त्वम् । अ꣣र्णवा꣢न् । ब꣣द्बधा꣣नान् । अ꣢रम्णाः । महा꣡न्त꣢म् । इ꣣न्द्र प꣡र्व꣢꣯तम् । वि । यत् । व꣡रिति꣢ । सृ꣣ज꣢त् । धा꣡राः꣢꣯ । अ꣡व꣢꣯ । यत् । दा꣣नवा꣢न् । ह꣣न् ॥३१५॥

Mantra without Swara
अदर्दरुत्समसृजो वि खानि त्वमर्णवान्बद्बधानाꣳ अरम्णाः । महान्तमिन्द्र पर्वतं वि यद्वः सृजद्धारा अव यद्दानवान्हन् ॥

अदर्दः । उत्सम् । उत् । सम् । असृजः । वि । खानि । त्वम् । अर्णवान् । बद्बधानान् । अरम्णाः । महान्तम् । इन्द्र पर्वतम् । वि । यत् । वरिति । सृजत् । धाराः । अव । यत् । दानवान् । हन् ॥३१५॥

Samveda - Mantra Number : 315
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 3;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 3; Khand » 9;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(इन्द्र) सूर्य ! (त्वम्) तू (यत्) जब (उत्सम्) गीले मेघ को (अदर्दः) विदीर्ण करता है (खानि) मेघों में शून्याकाशों को (विअसृजः) रच देता है (अर्णवान्) जल वाले समुद्रों को (बद्धवानान्) स्थिर जल वाले (अरम्णः) बनाता है (यत्) और जब (दानवान्) जलदायक (वः) उन मेघों को (हन्) नष्ट करता है और उनसे (धाराः) जलप्रवाहों को (अव सृजत्) वर्षाता है। तब (महान्तम्) बड़े (पर्वतम्) पर्वत को (वि) विनष्ट करता है॥
इसमें भी सूर्य के दृष्टान्त से राजकार्यों का उपदेश है कि — जिस प्रकार सूर्य मेध को विदीर्ण करता है, ऐसे ही राजा शत्रुदलस्थ जलाशयों को। जैसे सूर्य मेघ का नाश करके आकाश को खाली कर देता है, ऐसे ही राजा शत्रुदल को नष्ट करके आकाश (मैदान) कर दे। जैसे सूर्य मेघ के जलों से नदियां बहाकर स्थिर जल वाले समुद्र को भरता है, ऐसे राजा शत्रुओं के धनों से स्थिर निधि (कोष) भरे। जैसे सूर्य मेघों से जलधारा बहाता है, ऐसे राजा शत्रुशिरों से रक्तधारा। और जैसे सूर्य इस सबसे पर्वताकार मेघमण्डल का नाश करता है, इसी प्रकार राजा भी शत्रु के पर्वताकार दुर्गों (किलों) को तोड़े॥
Footnote
निघण्टु ३। २३ और निरुक्त १०। ९ तथा ऋ० ५। ३२। १ का पाठभेदादि संस्कृतभाष्य में देखिये॥