Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 31

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- प्रस्कण्वः काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- आग्नेयं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- आग्नेयं पर्व
Mantra with Swara
उ꣢दु꣣ त्यं꣢ जा꣣त꣡वे꣢दसं दे꣣वं꣡ व꣢हन्ति के꣣त꣡वः꣢ । दृ꣣शे꣡ विश्वा꣢꣯य꣣ सू꣡र्य꣢म् ॥३१॥

उ꣢त् । उ꣣ । त्य꣢म् । जा꣣त꣡वे꣢दसम् । जा꣣त꣢ । वे꣣दसम् । देव꣢म् । व꣣हन्ति । केत꣡वः꣢ । दृ꣣शे꣢ । वि꣡श्वा꣢꣯य । सू꣡र्य꣢꣯म् ॥३१॥

Mantra without Swara
उदु त्यं जातवेदसं देवं वहन्ति केतवः । दृशे विश्वाय सूर्यम् ॥

उत् । उ । त्यम् । जातवेदसम् । जात । वेदसम् । देवम् । वहन्ति । केतवः । दृशे । विश्वाय । सूर्यम् ॥३१॥

Samveda - Mantra Number : 31
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 3;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 3;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(उ) प्रश्न। हम परमात्मा को कैसे जानें ? उत्तर — (त्यम्) उस (जातवेदसम्) वेदों का प्रकाश करने वाले (देवम्) दिव्यगुणी (सूर्यम्) चराऽचरात्मा परमात्मा को (केतवः) प्रज्ञान अर्थात् उसके ज्ञानादि गुण (विश्वाय दृशे) सबके देखने के लिये (उत्-वहन्ति) जताते हैं॥
जिस प्रकार सूर्य अपने किरणों से जाना जाता है इसी प्रकार दिव्य गुणों वाला चराऽचर का आत्मा परमात्मा अपने चेतनत्वादि गुणों से सब जगत् को अपना ज्ञान कराता है अर्थात् सृष्टि को ज्ञानपूर्वक ज्ञानी प्रज्ञावान् ने रचा है। जड़कृत रचना सुडौल नहीं होती। इत्यादि प्रकार से परमात्मा का ज्ञान उसके गुणों से होता है। इसी प्रकार के वेदमन्त्र उन प्रकरणों का मूल हैं जो दर्शनशास्त्रों में परमात्मा की सिद्धि के विषय में तर्कवाद है॥
भौतिक पक्ष में— (उ) प्रश्न। इतनी दूर का सूर्य हम तक कैसे व्यापता है ? उत्तर— (त्यम्) उस [पूर्वमन्त्र में वर्णित] (जातवेदसम्) ज्ञान के प्रकाशक अन्धियारे को मिटाकर अज्ञान के नाशक (देवम्) दिव्य आश्चर्यगुणयुक्त (सूर्यम्) सूर्य को (केतवः) उसकी किरणें (विश्वाय) सबके (दृशे) देखने के लिये (उत्-वहन्ति) पहुँचाती हैं।
अर्थात् सूर्य अपनी किरणों द्वारा हमें व्यापता, प्रकाश करता, जगाकर ज्ञान को उत्तेजित करता और सर्व वस्तुओं को दिखाता है॥
Footnote
निघण्टु ५। १॥ ३। ९॥ ५। ६ तथा निरुक्त १२। १५ के प्रमाण संस्कृतभाष्य में देखिये॥ ऋग्वेद १। ५०। १ में भी ऐसा ही पाठ है। इस ऋचा का देवता सूर्य = अग्नि है। इस पर्व का नाम “आग्नेय” है इसलिये अन्य देवता भी इसी प्रसङ्ग का समझना चाहिये॥