Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 308

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- देवातिथिः काण्वः Chhand- बृहती Swara- मध्यमः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
अ꣡ध्व꣢र्यो द्रा꣣व꣢या꣣ त्व꣢꣫ꣳ सोम꣣मि꣡न्द्रः꣢ पिपासति । उ꣡पो꣢ नू꣣नं꣡ यु꣢युजे꣣ वृ꣡ष꣢णा꣣ ह꣢री꣣ आ꣡ च꣢ जगाम वृत्र꣣हा꣢ ॥३०८॥

अ꣡ध्व꣢꣯र्यो । द्रा꣣व꣡य꣢ । त्वम् । सो꣡म꣢꣯म् । इ꣡न्द्रः꣢꣯ । पि꣣पासति । उ꣡प꣢꣯ । उ꣣ । नून꣢म् । यु꣣युजे । वृ꣡ष꣢꣯णा । हरी꣢꣯इ꣡ति꣢ । आ । च꣣ । जगाम । वृत्रहा꣢ । वृ꣣त्र । हा꣢ ॥३०८॥

Mantra without Swara
अध्वर्यो द्रावया त्वꣳ सोममिन्द्रः पिपासति । उपो नूनं युयुजे वृषणा हरी आ च जगाम वृत्रहा ॥

अध्वर्यो । द्रावय । त्वम् । सोमम् । इन्द्रः । पिपासति । उप । उ । नूनम् । युयुजे । वृषणा । हरीइति । आ । च । जगाम । वृत्रहा । वृत्र । हा ॥३०८॥

Samveda - Mantra Number : 308
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 2;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 3; Khand » 8;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
अब यजमान अध्वर्यु से कहता है कि — (अध्वर्यो) यज्ञ में आहुत्यादि का ठीक करने वाला ऋत्विज् अध्वर्यु कहता है। हे अध्वर्यो ! (त्वम्) तू (सोमम्) सोमरस को (द्रावय) गीला कर (इन्द्रः) सूर्य (पिपासति) पीना चाहता है। (उ) तथा (वृषणा) वर्षाने वाली (हरी) तिरछी सीधी दो प्रकार की किरणों को (उप-युयुजे) उपयोग में लाता है (च) और (आ-जगाम) प्राप्त होता है [किरण द्वारा]॥
वृत्रहा का अर्थ मेघहन्ता ही विवरणकार के मत से सत्यव्रत सामश्रमी जी ने भी टिप्पणी में किया है॥
Footnote
ऋ० ८। ४। ११ में “उपनूनम्” ऐसा पाठ है॥