Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 307

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- मेधातिथि0मेध्यातिथी काण्वौ Chhand- बृहती Swara- मध्यमः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
आ꣢ त्वा꣣ सो꣡म꣢स्य꣣ ग꣡ल्द꣢या꣣ स꣢दा꣣ या꣡च꣢न्न꣣हं꣡ ज्या꣢ । भू꣡र्णिं꣢ मृ꣣गं꣡ न सव꣢꣯नेषु चुक्रुधं꣣ क꣡ ईशा꣢꣯नं꣣ न या꣢चिषत् ॥३०७॥

आ꣢ । त्वा꣣ । सो꣡म꣢꣯स्य । ग꣡ल्द꣢꣯या । स꣣दा꣢꣯ । या꣡च꣢꣯न् । अ꣣हम् । ज्या꣣ । भू꣡र्णि꣢꣯म् । मृ꣣ग꣢म् । न । स꣡व꣢꣯नेषु । चु꣣क्रुधम् । कः꣢ । ई꣡शा꣢꣯नम् । न । या꣣चिषत् ॥३०७॥

Mantra without Swara
आ त्वा सोमस्य गल्दया सदा याचन्नहं ज्या । भूर्णिं मृगं न सवनेषु चुक्रुधं क ईशानं न याचिषत् ॥

आ । त्वा । सोमस्य । गल्दया । सदा । याचन् । अहम् । ज्या । भूर्णिम् । मृगम् । न । सवनेषु । चुक्रुधम् । कः । ईशानम् । न । याचिषत् ॥३०७॥

Samveda - Mantra Number : 307
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 2;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 3; Khand » 8;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
प्रकरण से इन्द्र ! परमेश्वर ! (सवनेषु) यज्ञ के सवनों में (सोमस्य) सोमादि ओषधियों के (गल्दया) गालन के साथ तथा (ज्या) जयशील स्तुति के साथ (सदा) सर्वदा (त्वा) आप से (आ-याचन्) सब प्रकार प्रार्थना करता हुआ (अहम्) मैं यज्ञकर्त्ता दीक्षित (मृगम्) मृगादि किसी प्राणी पर (न चुक्रुधम्) क्रोध न करूँ। (भूर्णिम्) पोषण करने वाले (ईशानम्) स्वामी से (कः) कौन (न) नहीं (याचिषत्) माँगे। अर्थात् सब ही स्वामी से याचना करते हैं।
अर्थात् यज्ञ में दीक्षित यजमान को किसी प्राणी पर क्रोध न करना चाहिये। तथा परमात्मा की सर्वदा प्रार्थना करनी चाहिये॥
Footnote
ऋग्वेद ८। १। २० के पूर्वार्ध का पाठभेद और निरुक्त ६।२४ का प्रमाण संस्कृतभाष्य में देखिये॥