Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 306

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- प्रस्कण्वः काण्वः Chhand- बृहती Swara- मध्यमः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
अ꣣यं꣢ वां꣣ म꣡धु꣢मत्तमः सु꣣तः꣢꣫ सोमो꣣ दि꣡वि꣢ष्टिषु । त꣡म꣢श्विना पिबतं ति꣣रो꣡अ꣢ह्न्यं ध꣣त्त꣡ꣳ रत्ना꣢꣯नि दा꣣शु꣡षे꣢ ॥३०६॥

अ꣣य꣢म् । वा꣣म् । म꣡धु꣢꣯मत्तमः । सु꣣तः꣢ । सो꣡मः꣢꣯ । दि꣡वि꣢꣯ष्टिषु । तं । अ꣣श्विना । पिबतम् । तिरो꣡अ꣢ह्न्यम् । ति꣣रः꣢ । अ꣣ह्न्यम् । धत्त꣢म् । र꣡त्ना꣢꣯नि । दा꣣शु꣡षे꣢ ॥३०६॥

Mantra without Swara
अयं वां मधुमत्तमः सुतः सोमो दिविष्टिषु । तमश्विना पिबतं तिरोअह्न्यं धत्तꣳ रत्नानि दाशुषे ॥

अयम् । वाम् । मधुमत्तमः । सुतः । सोमः । दिविष्टिषु । तं । अश्विना । पिबतम् । तिरोअह्न्यम् । तिरः । अह्न्यम् । धत्तम् । रत्नानि । दाशुषे ॥३०६॥

Samveda - Mantra Number : 306
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 2;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 3; Khand » 8;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(अश्विना) सूर्य और चन्द्रमा ! (वाम्) तुम्हारे लिये (दिविठिषु) यज्ञों में (अयम्) यह (मधुमत्तमः) अतिमधुर (सोमः) ओषधि विशेष का रस (सुतः) खींचा है (तम्) उस (तिरो अहन्यम्) एक दिन बीते [रस] को (पिबतम्) ग्रहण करो और (दाशुषे) हवि देने वाले यजमान के लिये (रत्नानि) रमणीय पदार्थ (धत्तम्) धारित करो॥
अर्थात् जो मनुष्य ओषधियों का उत्तम मधुर एक दिन पुराना रस खींच कर सूर्य चन्द्रमा वा उनके दृष्टान्त से बताये हुए सभापति और सेनापति का यजन करते हैं उनको धनधान्यादि उत्तम रत्न प्राप्त होते हैं। अध्याय ३ के आरम्भ में सायणाचार्य ने इस मन्त्र का इन्द्र देवता अशुद्ध लिखा था, परन्तु यहाँ व्याख्या करते हुए भाष्य में अश्विनौ देवते व्याख्यात किये हैं जो कि ठीक भी हैं॥
Footnote
ऋग्वेद १। ४७। १ में “सुतः सोमऋतावृधा” इतना अन्तर है॥