Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 305

1875 Mantra
Devata- अश्विनौ Rishi- अश्विनौ वैवस्वतौ Chhand- बृहती Swara- मध्यमः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
कु꣢ष्ठः꣣ को꣡ वा꣢मश्विना तपा꣣नो꣡ दे꣢वा꣣ म꣡र्त्यः꣢ । घ्न꣣ता꣡ वा꣢मश्न꣣या꣡ क्षप꣢꣯माणो꣣ꣳशु꣢ने꣣त्थ꣢मु꣣ आ꣢द्व꣣न्य꣡था꣢ ॥३०५

कु꣢ । स्थः꣣ । कः꣢ । वा꣣म् । अश्विना । तपानः꣢ । दे꣢वा । म꣡र्त्यः꣢꣯ । घ्न꣣ता꣢ । वा꣣म् । अश्नया꣢ । क्ष꣡प꣢꣯माणः । अं꣣ऽशु꣡ना꣢ । इ꣣त्थ꣢म् । उ꣣ । आ꣢त् । उ꣣ । अन्य꣡था꣢ । अ꣣न् । य꣡था꣢꣯ ॥३०५॥

Mantra without Swara
कुष्ठः को वामश्विना तपानो देवा मर्त्यः । घ्नता वामश्नया क्षपमाणोꣳशुनेत्थमु आद्वन्यथा ॥३०५

कु । स्थः । कः । वाम् । अश्विना । तपानः । देवा । मर्त्यः । घ्नता । वाम् । अश्नया । क्षपमाणः । अंऽशुना । इत्थम् । उ । आत् । उ । अन्यथा । अन् । यथा ॥३०५॥

Samveda - Mantra Number : 305
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 2;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 3; Khand » 8;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(अश्विना) अश्विनी ! सूर्य और चन्द्रमाओ ! (देवाः) देवो ! प्रकाश को ! (कुष्ठः) पृथिवी पर स्थित (कः) कौन (मर्त्यः) मनुष्य (वाम्) तुमको (तपानः) प्रकाशित करने वाला है ? कोई नहीं। किन्तु तुम ही सबके प्रकाशक हो। (वाम्) तुम दोनों के लिये (अश्मया) मेघों में (घ्नता) जाते हुए (अंशुना) सोमादि ओषधिरस से (क्षयमाणः) क्षीण हुआ यजमान (यथा) जैसे कि (आद्वन्) कोई भोगी समृद्ध पुरुष होता है (इत्थम् उ) ऐसे ही होता है॥
अर्थात् सूर्य और चन्द्रमा को यद्यपि कौन है पृथिवी पर जो प्रकाश पहुँचा सके, किन्तु सूर्य चन्द्र ही सबको प्रकाशित करते हैं, तथापि मनुष्य सूर्य चन्द्र के लिये मेघमण्डल में होकर जाते हुए सोमादि ओषधियों के रस द्वारा आप्यायित करना चाहिये। जिससे सबके धन धान्यादि की वृद्धि हो।
Footnote
निघण्टु १। १० अष्टाध्यायी ७। १३९ के प्रमाण संस्कृतभाष्य में देखिये॥