Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 304

1875 Mantra
Devata- अश्विनौ Rishi- वसिष्ठो मैत्रावरुणिः Chhand- बृहती Swara- मध्यमः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
इ꣣मा꣡ उ꣢ वां꣣ दि꣡वि꣢ष्टय उ꣣स्रा꣡ ह꣢वन्ते अश्विना । अ꣣यं꣡ वा꣢म꣣ह्वे꣡ऽव꣢से शचीवसू꣣ वि꣡शं꣢ विश꣣ꣳ हि꣡ गच्छ꣢꣯थः ॥३०४

इ꣣माः꣢ । उ꣣ । वाम् । दि꣡वि꣢꣯ष्टयः । उ꣣स्रा꣢ । उ꣣ । स्रा꣢ । ह꣣वन्ते । अश्विना । अय꣢म् । वा꣣म् । अह्वे । अ꣡व꣢꣯से । श꣣चीवसू । शची । वसूइ꣡ति꣢ । वि꣡शं꣢꣯विशम् । वि꣡श꣢꣯म् । वि꣣शम् । हि꣢ । ग꣡च्छ꣢꣯थः ॥३०४॥

Mantra without Swara
इमा उ वां दिविष्टय उस्रा हवन्ते अश्विना । अयं वामह्वेऽवसे शचीवसू विशं विशꣳ हि गच्छथः ॥३०४

इमाः । उ । वाम् । दिविष्टयः । उस्रा । उ । स्रा । हवन्ते । अश्विना । अयम् । वाम् । अह्वे । अवसे । शचीवसू । शची । वसूइति । विशंविशम् । विशम् । विशम् । हि । गच्छथः ॥३०४॥

Samveda - Mantra Number : 304
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 2;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 3; Khand » 8;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
पूर्वमन्त्र में उषा का वर्णन करके अब सूर्य चन्द्रमा का वर्णन किया जाता है। (उस्त्रौ) जगत् को बसाने वालो ! (अश्विनौ) सूर्य और चन्द्रमाओ ! (दिविष्टयः) प्रकाश चाहती हुई (इमाः) ये प्रजायें (वाम् उ) तुमको ही (हवन्ते) प्राप्त करना चाहती हैं इस कारण (अयम्) यह मैं भी (वाम्) तुमको (श्रवसे) रक्षार्थ (अह्वे) प्राप्त करना चाहता हूं। (शचीवसू) बुद्धि और धन देने वालो ! (हि) क्योंकि तुम (विशंविशम्) प्रत्येक प्रजा को (गच्छथः) प्राप्त होते हो।
पृथिवी आदि ८ वसुओं के अन्तर्गत होने से सूर्य और चन्द्रमा भी वसु-वसाने वाले हैं, प्रजा को ज्योति और रस से व्यापते हैं इस लिये निरुक्तानुसार अश्विनौ कहाते हैं। प्रकाश द्वारा प्रजा की बुद्धि और धन की वृद्धि करने से निघण्टु के अनुसार शचीवसू कहाते हैं। ऐसे सूर्य और चन्द्र को प्रकाशार्थिनी प्रजायें नित्य चाहती हैं। इस कारण प्रत्येक मनुष्य को प्राप्त होते हुए सूर्य्य चन्द्रमाओं से उपकार लेना चाहिये॥
Footnote
उणादि २। १३ निरुक्त २२। १ निघंटु ३। ९ के प्रमाण संस्कृतभाष्य में देखिये॥ ऋ० ७। ७४। १ में भी॥