Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 303

1875 Mantra
Devata- उषाः Rishi- वसिष्ठो मैत्रावरुणिः Chhand- बृहती Swara- मध्यमः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
प्र꣡त्यु꣢ अदर्श्याय꣣त्यू꣢३꣱च्छ꣡न्ती꣢ दुहि꣣ता꣢ दि꣣वः꣢ । अ꣡पो꣢ म꣣ही꣡ वृ꣢णुते꣣ च꣡क्षु꣢षा꣣ त꣢मो꣣ ज्यो꣡ति꣢ष्कृणोति सू꣣न꣡री꣢ ॥३०३॥

प्र꣡ति꣢꣯ । उ꣣ । अदर्शि । आयती꣢ । आ꣣ । यती꣢ । उ꣣च्छ꣡न्ती꣢ । दुहि꣣ता꣢ । दि꣣वः꣢ । अ꣡प꣢꣯ । उ꣣ । मही꣢ । वृ꣣णुते । च꣡क्षु꣢꣯षा । त꣡मः꣢ । ज्यो꣡तिः꣢꣯ । कृ꣣णोति । सून꣡री꣢ । सु꣣ । न꣡री꣢꣯ ॥३०३॥

Mantra without Swara
प्रत्यु अदर्श्यायत्यू३च्छन्ती दुहिता दिवः । अपो मही वृणुते चक्षुषा तमो ज्योतिष्कृणोति सूनरी ॥

प्रति । उ । अदर्शि । आयती । आ । यती । उच्छन्ती । दुहिता । दिवः । अप । उ । मही । वृणुते । चक्षुषा । तमः । ज्योतिः । कृणोति । सूनरी । सु । नरी ॥३०३॥

Samveda - Mantra Number : 303
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 2;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 3; Khand » 8;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
प्रकरण से हे इन्द्र ! परमेश्वर ! (आयती) प्राती हुई (ऊ३च्छन्ती) अन्धकारों को हटाने वाली (दिवः) द्युलोक वा सूर्य की (दुहिता) पुत्री के तुल्य बुद्धि वा उषा (चक्षुषा) ज्ञान वा दर्शन से (तमः) अज्ञान वा अन्धकार को (अप-उ-वृणुते) निवृत्ति करती है। (सूनरी) मनुष्यों को सुमार्ग में ले जाने वाली (मही) बड़ी [बुद्धि वा उषा] (ज्योतिः) प्रकाश को (कृणोति) करती है (उ) निश्चय (प्रति-अदर्शि) [वह प्रतिदिन आपकी कृपा से] प्राप्त होती है।
Footnote
सायणाचार्य और उनकी देखादेखी ज्वालाप्रसाद जी ने मूलपाठ “ऊ३च्छन्ती” होने पर भी ऋग्वेदस्थ पाठ की भ्रान्ति से “व्युच्छन्ती” की व्याख्या की है। उच्छी बिवासे धातु से यह बना है। प्रतिदिन जब प्रातःकाल लोग सोकर उठते हैं तो बुद्धि तथा सूर्य से उत्पन्न हुई उषा (अरुणोदय की बेला = प्रातःकाल) दिखाई देती है, वह अज्ञान=अन्धकार को मिटाती और प्रकाश को फैलाती है। यद्यपि दिव् शब्द सूर्य का पर्याय नहीं है, तथापि दिव् के वाचक स्वः इत्यादि छः पद (निघं० १। ४) निरुक्त २।१३ के अनुसार द्युलोक और सूर्य दोनों के साधारण नाम हैं। इसलिये वास्तव में सूर्य को द्युस्थान-देवता होने से दिव् के पर्य्यायवाचक शब्दों से और दिव् शब्द से भी सूर्य का ग्रहण अनुचित नहीं है। तथा च निरुक्त ७। ५ में सूर्य को द्युस्थानदेवता कहा है। इस पर सत्यव्रत सामश्रमी जी भी टिप्पणी में स्वीकार करते हैं कि “सूर्य का दूसरा नाम प्रजापति भी है। बस सूर्य जो प्रतिदिन उषःकाल के पीछे-पीछे दौड़ता रहता है इसी से प्रजापति को कन्या के साथ बलात्कार का दोष लगाया गया।”॥ निघण्टु १। ८ में सूनरी उषा का नाम है॥ ऋ० ७। ८१। १ का पाठभेदादि संस्कृतभाष्य में देखिये॥