Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 30

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- वामदेवो गौतमः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- आग्नेयं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- आग्नेयं पर्व
Mantra with Swara
प꣢रि꣣ वा꣡ज꣢पतिः क꣣वि꣢र꣣ग्नि꣢र्ह꣣व्या꣡न्य꣢क्रमीत् । द꣢ध꣣द्र꣡त्ना꣢नि दा꣣शु꣡षे꣢ ॥३०॥

प꣡रि꣢꣯ । वा꣡ज꣢꣯पतिः । वा꣡ज꣢꣯ । प꣣तिः । कविः꣢ । अ꣣ग्निः꣢ । ह꣣व्या꣡नि꣢ । अ꣣क्रमीत् । द꣡ध꣢꣯त् । र꣡त्ना꣢꣯नि । दा꣣शु꣡षे꣢ ॥३०॥

Mantra without Swara
परि वाजपतिः कविरग्निर्हव्यान्यक्रमीत् । दधद्रत्नानि दाशुषे ॥

परि । वाजपतिः । वाज । पतिः । कविः । अग्निः । हव्यानि । अक्रमीत् । दधत् । रत्नानि । दाशुषे ॥३०॥

Samveda - Mantra Number : 30
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 3;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 3;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(वाजपतिः) अन्नपति अन्नदाता (कविः) बुद्धिमान् (अग्निः) प्रकाशस्वरूप परमात्मा (दाशुषे) दानी के लिये (हव्यानि) ग्रहणयोग्य (रत्नानि) धनों को (दधत्) देता हुआ (परि-अक्रमीत्) सर्वत्र व्याप रहा है।
यथार्थ में परमात्मा ही सबका अन्नदाता है और अनन्त ज्ञानवान् तथा प्रकाशवान् है। वह दानशीलों को अपनी व्यापकता से कर्मानुसार धनादि पदार्थ देता है।
भौतिक पक्ष में — (वाजपतिः) अन्न का पालक (कविः) बुद्धितत्त्ववाला (अग्निः) सूर्यरूप अग्नि (दाशुषे) यज्ञ करने वाले के लिये (हव्यांनि) हवनयोग्य (रत्नानि) धनों को (दधत्) देता हुआ (परि-अक्रमीत्) सब ओर व्यापता है॥
सूर्यरूप अग्नि दृष्टिद्वारा अन्न का पति है और प्रकाश द्वारा तमोगुण की निवृत्ति और बुद्धितत्त्व की वृद्धि करने से बुद्धितत्त्व वाला है। इसलिये उस सूर्य के द्वारा जगत् के उपकारार्थ हवनयोग्य अनेक रमणीय पदार्थों की प्राप्ति के लिये मनुष्यों को हवनशील होना चाहिये॥
Footnote
निघं० २।७॥ ३।१५॥ २।१०॥ ३।२० के प्रमाण संस्कृतभाष्य में देखिये॥ ऐसा ही पाठ ऋग्वेद ४।१५।३ में है॥