Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 3

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- मेधातिथिः काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- आग्नेयं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- आग्नेयं पर्व
Mantra with Swara
अ꣣ग्निं꣢ दू꣣तं꣡ वृ꣢णीमहे꣣ हो꣡ता꣢रं वि꣣श्व꣡वे꣢दसम् । अ꣣स्य꣢ य꣣ज्ञ꣡स्य꣢ सु꣣क्र꣡तु꣢म् ॥३॥

अ꣣ग्नि꣢म् । दू꣣त꣢म् । वृ꣣णीमहे । हो꣡ता꣢꣯रम् । वि꣣श्व꣡वे꣢दसम् । वि꣣श्व꣢ । वे꣣दसम् । अस्य꣢ । य꣣ज्ञ꣡स्य꣢ । सु꣣क्र꣡तु꣢म् । सु꣣ । क्र꣡तु꣢꣯म् ॥३॥

Mantra without Swara
अग्निं दूतं वृणीमहे होतारं विश्ववेदसम् । अस्य यज्ञस्य सुक्रतुम् ॥

अग्निम् । दूतम् । वृणीमहे । होतारम् । विश्ववेदसम् । विश्व । वेदसम् । अस्य । यज्ञस्य । सुक्रतुम् । सु । क्रतुम् ॥३॥

Samveda - Mantra Number : 3
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 1;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 1;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(विश्ववेदसम् ) सब को जताने वाले (होतारम्) देवों के — बुलाने वाले (अस्य) इस (यज्ञस्य) यज्ञ के ( सुक्रतुम) सुधारने वाले (दूतम्) दूत ( अग्निम् ) अग्नि को (वृणीमहे) हम वरण करते हैं अर्थात् स्वीकार करते हैं ।
तात्पर्य यह है कि यज्ञ का अग्नि दूत है । जिस प्रकार दूत द्वारा बुलाने वा सत्कार करने योग्यों को बुलाते हैं इसी प्रकार अग्नि द्वारा वायु आदि देवों को बुलाया जाता है । इस का प्रकार यह है कि जब कुण्ड में अग्नि स्थापना करके होम करते हैं तो अग्निकुण्ड के ऊपर छाये हुए वायु और वायु के अन्तर्गत अन्य ३३ में से कई भौतिक देवों को आहुति पहुंचा कर अग्नि अपनी उष्णता से हलका कर देता है, तब हलकी (लघु) वस्तु स्वाभाविक रीति पर जल पर तैल के समान ऊपर को हट जाती है और उसका स्थान रिक्त (खाली) हो जाता है परन्तु चारों ओर का वायु और उसके अन्तर्गत अन्य देव फिर उस स्थान को भर देते हैं, अग्नि फिर उन्हें भी अपनी उष्णता से आहुति पहुँचा हलका करके ऊपर को हटा देता है । इसी प्रकार बार-बार होता है, इस रीति से अग्नि दूत है जो वायु आदि देवतों का आवाहन कर करके विसर्जन करता जाता है । अग्नि सबका जताने वाला इसलिये है कि अग्नि में प्रकाश है और प्रकाश ज्ञान का साधन है, जहां प्रकाश होता है वहां जाना जाता है कि क्या है क्या नहीं है ? अन्धकार में अज्ञान होता है ।
ईश्वर विषय में:—( विश्ववेदसम्) सब के लिये वेदों द्वारा ज्ञान के दाता (होतारम्) व्यापकता से सब के ग्रहण करने वाले (दूतम् ) कर्मों का फल पहुंचाने वाले (अस्य) इस ( यज्ञस्य ) योगयज्ञ के ( सुक्रतम् ) संबारने वाले (अग्निम् ) परमात्मा को [ हम यजमान उस के भक्त उपासक लोग ] (वृणीमहे) वरण करते हैं—स्वीकार करते हैं॥
परमात्मा ही वेद द्वारा सब को ज्ञान का दाता, सब को कर्मफलप्रदाता, सब को सर्वत्र व्यापक होता हुआ पकड़ रहा है वा धारण कर रहा है, वही हमारी उपासना के सुन्दर फल का सम्पादक है, उसी की हम भक्ति करें यह आशय है ।
Footnote
अष्टाध्यायी ३ । २ । १३५ ॥ ६ । १ । ३४ ॥ उणादिकोष ४ । २६८ ॥ निघण्टु २ । १ ॥ के प्रमाण संस्कृतभाष्य में देखो । सायणाचार्य भी लिखते हैं कि तैत्तिरीय में कहा है कि “अग्नि देवों का दूत है” इत्यादि । यह ऋचा भी ऋग्वेद ( १ । १२ । १ ) में भी ऐसे ही है ॥