Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 297

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- मेध्यातिथिः काण्वः Chhand- बृहती Swara- मध्यमः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
क꣡ ईं꣢ वेद सु꣣ते꣢꣫ सचा꣣ पि꣡ब꣢न्तं꣣ क꣡द्वयो꣢꣯ दधे । अ꣣यं꣡ यः पुरो꣢꣯ विभि꣣न꣡त्त्योज꣢꣯सा मन्दा꣣नः꣢ शि꣣प्र्य꣡न्ध꣢सः ॥२९७॥

कः꣢ । ई꣣म् । वेद । सुते꣢ । स꣡चा꣢꣯ । पि꣡ब꣢꣯न्तम् । कत् । व꣡यः꣢꣯ । द꣣धे । अय꣢म् । यः । पु꣡रः꣢꣯ । वि꣣भिन꣡त्ति꣢ । वि꣣ । भिन꣡त्ति꣢ । ओ꣡ज꣢꣯सा । म꣣न्दानः꣢ । शि꣣प्री꣢ । अ꣡न्ध꣢꣯सः ॥२९७॥

Mantra without Swara
क ईं वेद सुते सचा पिबन्तं कद्वयो दधे । अयं यः पुरो विभिनत्त्योजसा मन्दानः शिप्र्यन्धसः ॥

कः । ईम् । वेद । सुते । सचा । पिबन्तम् । कत् । वयः । दधे । अयम् । यः । पुरः । विभिनत्ति । वि । भिनत्ति । ओजसा । मन्दानः । शिप्री । अन्धसः ॥२९७॥

Samveda - Mantra Number : 297
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 1;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 3; Khand » 7;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(सुते) सोमरस सम्पन्न होने पर (सचा) वायु आदि देवों के साथ (पिबन्तम्) रस लेते हुए (ईम्) इस इन्द्र को (कः) कौन (वेद) देख सकता है, कोई नहीं। (कत्) कितनी (वयः) आयु (दधे) धारण करता है। यह भी कौन जानता है, कोई नहीं। (यः) जो कि (अयम्) यह (अन्धसः) सामादि के रस से (मन्दानः) तृप्त हुआ (शिप्री) वेग वाला (ओजसा) बल से (पुरः) मेघों के दुर्गों [किलों] को (बिभिनत्ति) तोड़ता है। इन्द्र जो एक प्रकार का विद्युत्तत्त्व है वह वायु आदि सहित अदृश्य रूप से सोमादि ओषधियों के रस को पीता और उससे पुष्ट हुआ बलपूर्वक मेघ वर्षाता है और बड़ा वेगवान् है॥
Footnote
निरुक्त ६। १७ इत्यादि के प्रमाण संस्कृतभाष्य में देखिये॥ ऋग्वेद ८। ३३। ७ में भी॥