Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 295

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- मेधातिथि0मेध्यातिथी काण्वौ विश्वामित्र इत्येके Chhand- बृहती Swara- मध्यमः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
आ꣡ त्वा꣢३꣱द्य꣡ स꣢ब꣣र्दु꣡घा꣢ꣳ हु꣣वे꣡ गा꣢य꣣त्र꣡वे꣢पसम् । इ꣡न्द्रं꣢ धे꣣नु꣢ꣳ सु꣣दु꣢घा꣣म꣢न्या꣣मि꣡ष꣢मु꣣रु꣡धा꣢रामर꣣ङ्कृ꣡त꣢म् ॥२९५॥

आ꣢ । तु । अ꣣द्य꣢ । अ꣣ । द्य꣢ । स꣣ब꣡र्दुघाम् । स꣣बः । दु꣡घा꣢꣯म् । हु꣣वे꣢ । गा꣣यत्र꣡वे꣢पसम् । गा꣣यत्र꣢ । वे꣣पसम् । इ꣡न्द्र꣢꣯म् । धे꣣नु꣢म् । सु꣣दु꣡घा꣣म् । सु꣣ । दु꣡घा꣢꣯म् । अ꣡न्या꣢꣯म् । इ꣡ष꣢꣯म् । उ꣣रु꣡धा꣢राम् । उ꣣रु꣢ । धा꣣राम् । अरङ्कृ꣡त꣢म् । अ꣣रम् । कृ꣡त꣢꣯म् ॥२९५॥

Mantra without Swara
आ त्वा३द्य सबर्दुघाꣳ हुवे गायत्रवेपसम् । इन्द्रं धेनुꣳ सुदुघामन्यामिषमुरुधारामरङ्कृतम् ॥

आ । तु । अद्य । अ । द्य । सबर्दुघाम् । सबः । दुघाम् । हुवे । गायत्रवेपसम् । गायत्र । वेपसम् । इन्द्रम् । धेनुम् । सुदुघाम् । सु । दुघाम् । अन्याम् । इषम् । उरुधाराम् । उरु । धाराम् । अरङ्कृतम् । अरम् । कृतम् ॥२९५॥

Samveda - Mantra Number : 295
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 1;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 3; Khand » 7;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
स मन्त्र में श्लेषालंकार से इन्द्र अन्तरिक्षस्थान देव और परमेश्वर का वर्णन धेनु के तुल्य करते हैं। मैं (अद्य) अब (त्वा) तुझ (इन्द्रम्) परम ऐश्वर्य वाले (अरंकृतम्) कामना पूर्ण कर्त्ता को (सवर्दु घाम्) पय आदि की दुहने वाली (गायत्रवेपसम्) प्रशंसित गति वाली वा उत्तम चेष्टा वाली (सुदुघाम्) सुलभ रूप से दुहने योग्य (अन्याम्) और ही [विलक्षणा] (इषम्) चाहने योग्य (उरुधाराम्) बहुत धार वाली (धेनुम्) गौ के समान (आ-हुवे) वरित करता हूँ।
जिस प्रकार गौ सर्वोपकारिका हैं, इसी प्रकार इन्द्र भी वर्षा आदि द्वारा सर्वोपकारक है और परमेश्वर तो अत्यन्त उपकारक है।
Footnote
निघण्टु २। ९ इत्यादि का प्रमाण संस्कृतभाष्य में देखिये॥ ऋ० ८।१।१० में “आत्व १ द्य” इतना अन्तर है॥
यह अन्धपरम्परा की बात भी द्रष्टव्य है कि कलकत्ते के सायणभाष्य युक्त पुस्तक में “अद्य” के स्थान में “अघ” और “सुदुघाम्” के स्थान में “सुदुच्चाम्” छप गया है। तो ठीक ज्यों का त्यों ही अशुद्ध पं० ज्वालाप्रसाद भार्गव जी ने भी छाप धरा है। भाष्य में अद्य और सुदुधाम् की ही व्याख्या है। क्योंकि सायणभाष्य में भी वैसा ही है॥