Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 292

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- मेधातिथि0मेध्यातिथी काण्वौ Chhand- बृहती Swara- मध्यमः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
व꣡स्या꣢ꣳ इन्द्रासि मे पि꣣तु꣢रु꣣त꣢꣫ भ्रातु꣣र꣡भु꣢ञ्जतः । मा꣣ता꣡ च꣢ मे छदयथः स꣣मा꣡ व꣢सो वसुत्व꣣ना꣢य꣣ रा꣡ध꣢से ॥२९२

व꣡स्या꣢न् । इ꣢न्द्र । असि । मे । पितुः꣢ । उ꣢त꣢ । भ्रा꣡तुः꣢ । अ꣡भु꣢ञ्जतः । अ । भु꣢ञ्जतः । माता꣢ । च꣢ । मे । छदयथः । समा꣢ । स꣢ । मा꣢ । व꣢सो । वसुत्वना꣡य꣢ । रा꣡ध꣢से ॥२९२॥

Mantra without Swara
वस्याꣳ इन्द्रासि मे पितुरुत भ्रातुरभुञ्जतः । माता च मे छदयथः समा वसो वसुत्वनाय राधसे ॥२९२

वस्यान् । इन्द्र । असि । मे । पितुः । उत । भ्रातुः । अभुञ्जतः । अ । भुञ्जतः । माता । च । मे । छदयथः । समा । स । मा । वसो । वसुत्वनाय । राधसे ॥२९२॥

Samveda - Mantra Number : 292
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 5;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 3; Khand » 6;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(वसो) हे वासहेतु ! (इन्द्र) परमेश्वर ! (अभुञ्जतः) न पालने वाले (मे) मेरे (पितुः) पिता (उत) और (भ्रातुः) भ्राता से अधिक आप (वस्याम्) वसाने वाले (असि) हैं (च) और (मे) मेरी (माता) जननी (समा) सब काल में समान प्रीति रखती है। (वसुत्वनाय) निवास और (राधसे) धन के लिये (छदयथः) [माता और आप मेरा] पोषण करते हैं।
अर्थात् जब मनुष्य माता की सेवा पालन शुश्रूषा नहीं करता तब भी माता उस पर समान ही स्नेह रखती है। तथा परमेश्वर भी सब काल में इसका पोषरण करता है। अन्य पिता माता आदि इतने नहीं। इस में माता शारीरिक और परमात्मा आत्मिक पुष्टि विशेषतः करते हैं।
Footnote
निघण्टु ३। १४ का प्रमाण संस्कृतभाष्य में देखिये॥ ऋ० ८। १। ६ में भी॥