Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 29

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- गोपवन आत्रेयः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- आग्नेयं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- आग्नेयं पर्व
Mantra with Swara
तं꣡ त्वा꣢ गो꣣प꣡व꣢नो गि꣣रा꣡ जनि꣢꣯ष्ठदग्ने अङ्गिरः । स꣡ पा꣢वक श्रुधी꣣ ह꣡व꣢म् ॥२९॥

त꣢म् । त्वा꣣ । गो꣣प꣡व꣢नः । गि꣣रा꣢ । ज꣡नि꣢꣯ष्ठत् । अ꣣ग्ने । अङ्गिरः । सः꣢ । पा꣣वक । श्रुधी । ह꣡व꣢꣯म् ॥२९॥

Mantra without Swara
तं त्वा गोपवनो गिरा जनिष्ठदग्ने अङ्गिरः । स पावक श्रुधी हवम् ॥

तम् । त्वा । गोपवनः । गिरा । जनिष्ठत् । अग्ने । अङ्गिरः । सः । पावक । श्रुधी । हवम् ॥२९॥

Samveda - Mantra Number : 29
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 3;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 3;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(अग्ने) ज्ञानसागर ! (तम्) पूर्वोक्त (त्वा) आपको (गोपवनः) वाणी का पवित्र रखने वाला (गिरा) वाणी से (जनिष्ठत्) प्रकट करता है, अर्थात् वाणी से स्तुति करता है कि (अंगिरः) हे ज्ञाननिधे ! (पावक) हे पवित्र कारक ! पतितपावन ! (सः) ऐसे तुम (हवम्) स्तोत्र को (श्रुधि) अङ्गीकार करो॥
पवित्रवाणी वाला पुरुष परमात्मा से प्रार्थना करे कि दयानिधे ! मेरी प्रार्थना स्तुति को अङ्गीकार करो॥
भौतिक पक्ष में— (अग्ने) अग्ने ! (तम्) पूर्वोक्त (त्वा) तुझ को (गोपवनः) पवित्र वाणी वाला उद्गाता (गिरा) वाणी से (जनिष्ठत्) प्रकट करता है कि (अंगिरः) अङ्गारों वाले दहकते ! (पावक) शोधने वाले ! (सः) इस प्रकार के तुम (हवम्) गुणवर्णन को (श्रुघि) अङ्गीकार करो॥
संसार भर की पवित्रता चाहने वाले को योग्य है कि प्रथम स्वयं पवित्र होकर अग्नि का आधान और गुणवर्णन वाले मन्त्रों का पाठ करे। ऐसा करने से दहकता हुआ शोधक अग्नि उसके वर्णन को अङ्गीकार करता है। अर्थात् उसके जाने तथा वर्णन किये अनुसार काम देने लगता है। खोजने से मिलता है॥
मन्त्र में गोपवन शब्द देखकर कोई लोग शङ्का करते हैं कि इसके द्रष्टा का नाम भी गोपवन है इसलिये यह मन्त्र उसी ने रच लिया है। इसका समाधान १ दशति के आठवें मन्त्र के भाष्य में कर चुके हैं।
Footnote
निघं० १।११॥ ५।५॥ उणादि २।६७॥ अष्टाध्यायी ३।६।१३७॥ का प्रमाण संस्कृतभाष्य में देखिये॥ ऋग्वेद ८।६३।११ में “तम्” के स्थान में “यम्” पाठ है॥