Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 289

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- मेध्यातिथिः काण्वः Chhand- बृहती Swara- मध्यमः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
पा꣣हि꣡ गा अन्ध꣢꣯सो꣣ म꣢द꣣ इ꣡न्द्रा꣢य मेध्यातिथे । यः꣡ सम्मि꣢꣯श्लो ह꣢र्यो꣣र्यो꣡ हि꣢र꣣ण्य꣢य꣣ इ꣡न्द्रो꣢ व꣣ज्री꣡ हि꣢र꣣ण्य꣡यः꣢ ॥२८९॥

पा꣣हि꣢ । गाः । अ꣡न्ध꣢꣯सः । म꣡दे꣢꣯ । इ꣡न्द्रा꣢꣯य । मे꣣ध्यातिथे । मेध्य । अतिथे । यः꣢ । स꣡म्मि꣢꣯श्लः । सम् । मि꣣श्लः । ह꣡र्योः꣢꣯ । यः । हि꣣रण्य꣡यः । इ꣡न्द्रः꣢꣯ । व꣣ज्री꣢ । हि꣣रण्य꣡यः꣢ ॥२८९॥

Mantra without Swara
पाहि गा अन्धसो मद इन्द्राय मेध्यातिथे । यः सम्मिश्लो हर्योर्यो हिरण्यय इन्द्रो वज्री हिरण्ययः ॥

पाहि । गाः । अन्धसः । मदे । इन्द्राय । मेध्यातिथे । मेध्य । अतिथे । यः । सम्मिश्लः । सम् । मिश्लः । हर्योः । यः । हिरण्ययः । इन्द्रः । वज्री । हिरण्ययः ॥२८९॥

Samveda - Mantra Number : 289
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 5;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 3; Khand » 6;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(मेध्यातिथे) हे परमेश्वर से संगतियोग्य ! निरन्तर देहान्तर को जाने वाले ! जीवात्मन् ! तू (इन्द्राय) परमेश्वर प्राप्ति के लिये (अन्धसः) उत्तम उत्तम भोजनादि के (मदे) मद में (गाः) इन्द्रियों की [विषयों से] (पाहि) रक्षा कर [क्योंकि] (यः) जो (इन्द्रः) परमेश्वर (हिरण्ययः) ज्योतिर्मय है और जो (हर्योः) हरणशील आत्मा और मन में (संमिश्लः) मिल रहा है व्यापक है और जो (वज्री) दुष्ट विषयलोलुपों को दण्ड धारण किये हैं (हिरण्ययः) ज्योतिःस्वरूप है। वह अजितेन्द्रियों को नहीं मिल सकता। यह भाव है॥
Footnote
हिरण्यय पद के दो बार पाठ से परमात्मा की ज्योति की अतिशयता और मदान्धों को नहीं पा सकता, यह सूचित किया है। निघण्टु १। ४। २। ७ इत्यादि प्रमाण और ऋ० ८। ३३। ४ का पाठान्तर संस्कृतभाष्य में देखिये॥