Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 28

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- शुनः शेप आजीगर्तिः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- आग्नेयं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- आग्नेयं पर्व
Mantra with Swara
इ꣣म꣢मू꣣ षु꣢꣫ त्वम꣣स्मा꣡क꣢ꣳ स꣣निं꣡ गा꣢य꣣त्रं꣡ नव्या꣢꣯ꣳसम् । अ꣡ग्ने꣢ दे꣣वे꣢षु꣣ प्र꣡ वो꣢चः ॥२८॥

इ꣣म꣢म् । उ꣣ । सु꣢ । त्वम् । अ꣣स्मा꣡क꣢म् । स꣣नि꣢म् । गा꣣यत्र꣢म् । न꣡व्याँ꣢꣯सम् । अ꣡ग्ने꣢꣯ । दे꣣वे꣡षु꣢ । प्र । वो꣣चः ॥२८॥

Mantra without Swara
इममू षु त्वमस्माकꣳ सनिं गायत्रं नव्याꣳसम् । अग्ने देवेषु प्र वोचः ॥

इमम् । उ । सु । त्वम् । अस्माकम् । सनिम् । गायत्रम् । नव्याँसम् । अग्ने । देवेषु । प्र । वोचः ॥२८॥

Samveda - Mantra Number : 28
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 3;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 3;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(अग्ने) ज्ञानप्रद ! (अस्माकम्, इमम्, नव्यांसम्, सनिम्) हमारे, इस, नवीनतर, हव्य को (उ) और (देवेषु) देवों के विषय में (गायत्रम्) गायत्र्यादि छन्दोविशिष्ट मन्त्रपाठ को (त्वम्) आप (सु-प्र-वोचः) भले प्रकार उपदेश करते हैं। हे परमात्मन् ! आप बड़े दयालु हैं जो कि हमारे लिये हव्यदान और साथ में मन्त्रपाठ के गान का उपदेश करते हैं, जो हमारे कल्याण का हेतु है॥
भौतिक पक्ष में—(अग्ने) अग्ने ! (त्वम्) तू (अस्माकम्, इमम्, नव्यांसम्, सनिम्) हमारे, इस, नवीनतर, हव्य को (उ) और (देवेषु) देवों के विषय में (गायत्रम्) मन्त्रगान को (सु-प्र-वोचः) भले प्रकार प्राप्त कराना और बोलता है॥
अग्नि ही आहवनीयादि रूप मे हमारे उत्तम-उत्तम नवीन (ताजे) हव्य पदार्थों को देवतों में पहुँचाता है। और अग्नि ही वाणी रूप होकर मन्त्रपाठ करता है। अग्नि के रूप होने में १ दशति के ६ मन्त्रभाष्य में प्रमाण देखिये॥
Footnote
अष्टाध्यायी ६।३।१३६॥ ३।२।२७॥ ८।३।१०७॥ ३।४। ६॥ ३।१।५२॥ ७। ४।२० के प्रमाण संस्कृतभाष्य में देखिये॥ ऋग्वेद १।२७।४ में भी ऐसा ही पाठ है॥