Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 278

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- पुरुहन्मा आङ्गिरसः Chhand- बृहती Swara- मध्यमः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
य꣡द्द्याव꣢꣯ इन्द्र ते श꣣त꣢ꣳ श꣣तं꣡ भूमी꣢꣯रु꣣त꣢ स्युः । न꣡ त्वा꣢ वज्रिन्त्स꣣ह꣢स्र꣣ꣳ सू꣢र्या꣣ अ꣢नु꣣ न꣢ जा꣣त꣡म꣢ष्ट꣣ रो꣡द꣢सी ॥२७८॥

य꣢त् । द्या꣡वः꣢꣯ । इ꣣न्द्र । ते । शत꣢म् । श꣣त꣢म् । भू꣡मीः꣢꣯ । उ꣣त꣢ । स्युः । न । त्वा꣣ । वज्रिन् । सह꣡स्र꣢म् । सू꣡र्याः꣢꣯ । अ꣡नु꣢꣯ । न । जा꣣त꣢म् । अ꣣ष्ट । रो꣡द꣢꣯सी꣣इ꣡ति꣢ ॥२७८॥

Mantra without Swara
यद्द्याव इन्द्र ते शतꣳ शतं भूमीरुत स्युः । न त्वा वज्रिन्त्सहस्रꣳ सूर्या अनु न जातमष्ट रोदसी ॥

यत् । द्यावः । इन्द्र । ते । शतम् । शतम् । भूमीः । उत । स्युः । न । त्वा । वज्रिन् । सहस्रम् । सूर्याः । अनु । न । जातम् । अष्ट । रोदसीइति ॥२७८॥

Samveda - Mantra Number : 278
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 4;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 3; Khand » 5;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(इन्द्र) हे परमेश्वर ! (यत्) यदि (द्यावः) द्युलोक (शतम्) सैंकड़ों (स्युः) हों। [तो भी] (ते) आप को (न) नहीं (अनु) साथ (अष्ट) व्याप सकते (उत) और (भूमीः) पृथिवीलोक (शतम्) सैकड़ों हों, तब भी नहीं व्याप सकते। (वज्रिन्) हे दुष्टों को दण्डदाता ! (सहस्त्रम्) असंख्यात (सूर्याः) सूर्य लोक भी (त्वा) आप को [नहीं व्याप सकते] (रोदसी) द्यावा पृथिवी [आपको नहीं व्याप सकते] (जातम्) उत्पन्न जगत् मात्र (न) आपको नहीं व्याप सकता क्योंकि आप अनन्त और सबसे बड़े हैं। “पृथिवी से बड़ा, अन्तरिक्ष से बड़ा, द्युलोक से बड़ा और इन सब लोकों से भी बड़ा है” ऐसा कहा सुनते हैं।
Footnote
निघण्टु ३। १॥ २। १८॥ ३। ३० के प्रमाण संस्कृतभाष्य में देखिये॥ ऋग्वेद ८। ७०। ५ में भी॥