Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 27

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- विरूप आङ्गिरसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- आग्नेयं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- आग्नेयं पर्व
Mantra with Swara
अ꣣ग्नि꣢र्मू꣣र्धा꣢ दि꣣वः꣢ क꣣कु꣡त्पतिः꣢꣯ पृथि꣣व्या꣢ अ꣣य꣢म् । अ꣣पा꣡ꣳ रेता꣢꣯ꣳसि जिन्वति ॥२७॥

अ꣣ग्निः꣢ । मू꣣र्धा꣢ । दि꣣वः꣢ । क꣣कु꣢त् । प꣡तिः꣢꣯ । पृ꣣थिव्याः꣢ । अ꣣य꣢म् । अ꣣पां꣢ । रे꣡ताँ꣢꣯सि । जि꣣न्वति ॥२७॥

Mantra without Swara
अग्निर्मूर्धा दिवः ककुत्पतिः पृथिव्या अयम् । अपाꣳ रेताꣳसि जिन्वति ॥

अग्निः । मूर्धा । दिवः । ककुत् । पतिः । पृथिव्याः । अयम् । अपां । रेताँसि । जिन्वति ॥२७॥

Samveda - Mantra Number : 27
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 3;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 3;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(अयम्) यह (अग्निः) प्रकाशमान परमात्मा (मूर्द्धा) सर्वोच्च है और (दिवः, ककुत्) प्रकाश की, टाट है। जिस प्रकार बैल की टाट सब अङ्गों मे ऊँची होती है इसी प्रकार परमात्मा का प्रकाश अन्य सबके प्रकाशों से उत्तम है। (पृथिव्याः) पृथिव्यादि लोकों का (पतिः) पालक है और (अपाम्) कर्मों के (रेतांसि) बीजों को (जिन्वति) जानता है।
सर्वोच्च सर्वोत्तम प्रकाशस्वरूप परमात्मा सबके कर्मों का साक्षी और फलप्रदाता तथा ज्ञाता है॥
भौतिक पक्ष में— (अयम्, अग्निः) यह अग्नि (मूर्द्धा) ऊर्ध्वगमनशील होने से उच्च और (दिवः ककुत्) प्रकाश की टाट है। तथा (पृथिव्याः) पृथिव्यादि लोकों का पालक है और (अपाम्) अन्तरिक्ष के मध्य में (रेतांसि) जलों को (जिन्वति) पहुँचाता है।
अर्थात् अग्नि सदा ऊपर को जाने वाला, वाय्वादि देवों का मस्तक के समान है, और प्रकाश का उत्तुङ्ग पुञ्ज है, तथा शिल्पक्रियाकलाप यज्ञ आदि द्वारा पृथिव्यादिलोकस्थ प्राणिवर्ग का पति है, और यही अत्यन्त नीचे स्थान समुद्र के जल अदृष्टपार अन्तरिक्ष के मध्य में पहुँचाय मेघ बनाय वर्षाता है।
Footnote
निघं० २। १॥ १। ३॥ २। १४॥ १। १२॥ के प्रमाण संस्कृतभाष्य में देखिये॥ ऋग्वेद (८। ४४। १६) में भी ऐसा ही पाठ है॥