Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 267

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- नृमेध आङ्गिरसः Chhand- बृहती Swara- मध्यमः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
श्रा꣡य꣢न्त इव꣣ सू꣢र्यं꣣ वि꣡श्वेदिन्द्र꣢꣯स्य भक्षत । व꣡सू꣢नि जा꣣तो꣡ जनि꣢꣯मा꣣न्यो꣡ज꣢सा꣣ प्र꣡ति꣢ भा꣣गं꣡ न दी꣢꣯धिमः ॥२६७॥

श्रा꣡य꣢꣯न्तः । इ꣣व । सू꣡र्य꣢꣯म् । वि꣡श्वा꣢꣯ । इत् । इ꣡न्द्र꣢꣯स्य । भ꣣क्षत । व꣡सू꣢꣯नि । जा꣣तः꣢ । ज꣡नि꣢꣯मानि । ओ꣡ज꣢꣯सा । प्र꣡ति꣢꣯ । भा꣣ग꣢म् । न । दी꣣धिमः ॥२६७॥

Mantra without Swara
श्रायन्त इव सूर्यं विश्वेदिन्द्रस्य भक्षत । वसूनि जातो जनिमान्योजसा प्रति भागं न दीधिमः ॥

श्रायन्तः । इव । सूर्यम् । विश्वा । इत् । इन्द्रस्य । भक्षत । वसूनि । जातः । जनिमानि । ओजसा । प्रति । भागम् । न । दीधिमः ॥२६७॥

Samveda - Mantra Number : 267
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 3;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 3; Khand » 4;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
मित्रो ! (विश्वा) समस्त (जाता) जो उत्पन्न हो चुके (उ) और (जनिमानि) जो उत्पन्न होवेंगे (ओजसा) बल सहित वे सब (वसूनि) धन (इन्द्रस्य) परमेश्वर के (इत्) ही हैं। (प्रति, भागम्) अपने भाग के अनुसार (न) जैसे [पिता के धन को पुत्र] (भक्षत) भोगो (दीधिमः) उन्हीं को हम धारण करते हैं। दृष्टान्त — (श्रायन्त इव सूर्यम्) जैसे सूर्य से उत्पन्न हुई किरणें सूर्य से ही प्रकाश लेती हैं॥
Footnote
सायणाचार्य ने और टिप्पणी में विवरणकार के मत से सामश्रमी जी ने ‘जाते’ इस पद की व्याख्या की है। परन्तु मूल और सामगान दोनों में “जातो” पाठ देखा जाता है, जिसके “जाता, उ” ये दो पद होते हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि ऋग्वेद ८। ९९। ३ के “जाते जनमान ओजसा प्रति मागं न दीधिन” इस पाठ में “जा” पाठ देखकर यह भ्रान्ति हुई है। और सायणभाष्य में उसी का निरुक्त भी उद्धृत किया है। परन्तु ऐसा करने पर यह भाष्य मूल से अनुकूल नहीं रहता॥